वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ……..

वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ
के एक बार मिल कर मुझ से, फिर बिछड़ जाने के लिए आ

मुमकिन है अब ये होश भी साथ ने दे मेरा
मुझ बेहोश पर एक चादर चढ़ाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पाक-ऐ-मोहोब्बत की जूनून को समझ
के कभी तो तू भी मुझको मानाने के लिए आ

जनता हू अब वो रिस्ता-ऐ-रस्म-ऐ-दिल नहीं है
खैर एक नया रिश्ता ही बनाने के लिए आ

किस किस को बताऊ मैँ, इस दिल के किस्से को
तू मेरे लिए न सही, इस ज़माने के लिए आ

यकीं-ऐ-चिराग अब भी जल रहा है मेरे सीने मैँ
एक आखरी अहसान कर, इसको बुझाने के लिए आ………………….!!

D K

Comments

8 responses to “वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ……..”

    1. Dev Kumar Avatar
      Dev Kumar

      THanku so much

    1. Dev Kumar Avatar
      Dev Kumar

      THanku Saxena JI

  1. Abhishek kumar

    Wow

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