माघ की इस सार्दी में
जब ये हवा चली
जो खिलती धूप की गर्माहट में
लग रही है भली।
जरा–से बादल
हल्की–सी हवा
कभी गरम
कभी नरम।
सूरज बादलों की खिड़की से
है झांक रहा
कभी–कभी सर्दी से
मैं भी हूँ कांप रहा
लेकिन फिर आते ही
धूप की चमक
मौसम दिखा रहा है
अपनी दमक।
पेड़ झूम रहे हैं
इस हवा में
ले रहे हैं
एक दवा वें
उस सन्नाटे भरी
सुनसानपन की
(सुनसानपन से बचने की)
जो थी भरी
उनमें कईं दिनों की।
धूप को सेंककर
हल्की हवा को देखकर
वें भी रहे हैं खिल
जबकि फूल आने को
अभी बाकी हैं कईं दिन
लेकिन खिला रहें हैं खुद को
(खिल रहें हैं खुद में)
अभी से
ताकि फूल खिल सकें
सही से
और उनको
रस मिल सके
दूसरों को महकाने वाला
तभी तो
अभी से
फूलों को महकाने वाले
रस को बनाने वाले
और फूलों में चमक लाने वाले
जीवन सौंदर्य को
ये पेड़
कर रहें हैं एकत्र
इन पेड़ों के बिना
हमारा जीवन
एक नाम ही है मात्र।
पेड़ करते हैं
प्रकृति और जीवन को
बचाने का वादा
हम इनकी पहचान
क्यों नहीं करते
क्यों नहीं जान पाते इनका ईरादा।
–कुमार बन्टी

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