इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।

इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।
जब से तुम गए आफ़ताब नहीं देखा हमने।।
,
लफ्ज़ दर लफ्ज़ हम क्या क्या नहीं हुए थे।
पर खुद का लिखा किताब नहीं देखा हमने।।
,
हमारी मौत के बाद सजती रहती है महफिले।
मगर जीते जी कभी ख़िताब नहीं देखा हमनें।।
,
अब जिंदगी से नहीं है शिकवे शिकायत कोई।
बस अधूरे सवाल थे जवाब नहीं देखा हमनें।।
,
जिसकों जैसा देखना चाहा वैसा देखा ताउम्र।
साहिल कभी खुद को खराब नहीं देखा हमनें।।
@@@@RK@@@@

Comments

9 responses to “इक अरसे से कोई ख्वाब नहीं देखा हमने।”

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  1. Kumar Bunty Avatar
    Kumar Bunty

    UMDA

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Abhishek kumar

    सुन्दर रचना

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