हम तेरे वादों की जब गहराई में उतरे।

हम तेरे वादों की जब गहराई में उतरे।
सदमा सा लगा जब सच्चाई में उतरे।।
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तुमको ढूंढते रहें थे महफिल महफिल।
पर सुकून मिला जब तन्हाई में उतरे।।
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जिसनें चाहा जैसा वैसा बनाया खुद को।
कुछ ने बुरा किया कुछ अच्छाई में उतरे।।
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हमे जो तजुर्बा हुआ वही लिखतें रहें है।
जो फुरसत दे जिंदगी तो रानाई में उतरे।।
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अज़ीब है वो ही कहतें है बेवफा हमकों।
जिसने वफ़ा की ही नहीं,बेवफ़ाई में उतरे।
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ज़िन्दगी तेरी तपिश में हम तो राख हो गए।
अब तो छाह कर जो बचे है परछाई में उतरे।।
@@@@RK@@@@

Comments

7 responses to “हम तेरे वादों की जब गहराई में उतरे।”

  1. Sridhar Avatar

    kya baat he…badhaai

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

  3. Abhishek kumar

    सुन्दर रचना

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