8 Comments

    1. एक शायरी याद आ गयी इस poem पे
      कशमकश है तुझे जख्म दिखाऊ किसे और किसे नहीं
      माना बेगाने समझते नहीं और अपनों को दिखते नहीं
      लेकिन हौसला ना हार गिरकर ए मुसाफिर
      जहाँ मिला दर्द तुझे, दवा भी मिलेगी वहीँ…
      बस आँखों में पड़ी धूल हटाने की जरुरत है…?☺

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