घर मेरा तुम्हें हवादार नहीं लगता।

घर मेरा तुम्हें हवादार नहीं

लगता।

मैने हकीकत कही तुम्हें असरदार

नहीं लगता।।

,

कि कशती कहीं डूब न जाए सफर

में मेरी।

तुम दुआ करो तूफान मेरा तरफदार

नहीं लगता।।

,

शक्ल से कहा हो पाएगा तुम्हें कुछ

अंदाजा।

मुसकुराता रहा हूँ जख्म है,पर बिमार

नहीं लगता।।

,

और ढूँढना पड़ता है जिंदगी में इक

इक लमहा।

सच है कि खुशियों का कहीं बाजार

नहीं लगता।।

,

वैसे तो खबरों की कोई कमी नहीं है

इनमें।

मगर क्या कहे साहिल ये अखबार

नहीं लगता।।

@@@@RK@@@@

Comments

7 responses to “घर मेरा तुम्हें हवादार नहीं लगता।”

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  1. Abhishek kumar

    Nice

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