चलते हुए कदमो के निशां को बदलते हुए देखा हमने।
हर रिस्ते नातों को आज बदलते हुए देखा हमने।
जो कभी टूट कर चाहा करती थी जमाने हमें,
आज उसे ही छोड़ जमाने , जाते देखा हमने।
मौसम तो वही है जो था फिजाओं मे कभी,
पर मौसम का तेवर आज बदलते देखा हमने।
कहते है ख्वाब ऊची रख्खों तो मंजिल भी ऊची होगी,
पर अक्सर नींद संग ख्वाब टुटते देखा हमने।
देख ली सारी जिन्दगी ,देख ली “योगी”
कि दिल के अरमा को सरे राह लुटते देखा हमने।
योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोडा़ (छ.ग.)
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