शायरी

ऊपर से टपक रही है छत
नीचे सीलन आ गई दीवारों में
दाम किसी काम के मिलते नहीं
चाहे हम खुद भी बिक जाएँ बाज़ारों में।

Comments

3 responses to “शायरी”

    1. Kumar Bunty Avatar

      शुक्रिया जनाब

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