ए खुदा ख्वाइशों का समंदर कम कर दे
इस तपते जिगर को बारिश मैं धुंआ कर दे
दिल मैं जो अरमान से उठते हैं
तू किसी पत्थर के तले उनको दफन कर ले
जुगनू सा चमकने कि जो ख्वाइस थी
तू स्याह अंधेरों मैं उसे कही गुम कर दे
ये जो पॉव चलते है मंज़िल की तरफ
तू पत्थरों की ठोकर से लहू कर दे
ये जो अरमान जीने के बाकी है
तू किसी कब्र मैं इनको दफन कर दे
जिंदगी के इस लंबे सफर को
इन रास्तों मैं कही गुम कर दे
ये जो फ़ितरत है तुझसे मिलने की
तू किसी रोज़ करिश्में से इसे पूरा कर दे
ए खुदा ख्वाइशों का समंदर कम कर दे
Comments
2 responses to “ए खुदा ख्वाइशों का समंदर कम कर दे”
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Waah
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सुपर
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