दीदार-ए-नजर जो हो गयी है
Comments
4 responses to “दीदार-ए-नजर जो हो गयी है”
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बहुत अच्छी कविता
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nice 🙂
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nice
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जागी है इसतरह से तेरी कामना!
जाँम को लबों से हो जैसे थामना!
बर्फ सी पिघल रही है हसरतें मेरी,
ख्वाब का हो आग से जैसे सामना!
वाह बहुत खूब
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