ममता

ये पेशानी पे जो लकीरें सी खिंची हुईं है,
आँखों के तले बेनूर रातें सी बिछीं हुईं हैं,
ये जो कांपते हाथों में काँच की चूड़ियाँ हैं,
ऐश-ओ-आराम से जो ताउम्र की दूरियाँ हैं,

ये जो मुस्कुराते होंठ हैं, दर्द को दबाए हुए,
सीने में तमन्नाओं की तुर्बतें छुपाए हुए,
ये जो साड़ियों के कोने कोने हैं फटे हुए,
सालों साल से बस तीन रंगों में बँटे हुए,

ये जो हाथों में गर्म दूध का इक गिलास है,
बूढ़ी आँखों की लौ में भी जो इक आस है,
ये जो सर पर मेरे कोमल सा एक हाथ है,
एक साया, एक दुआ जो हमेशा साथ है,

ये सारी दौलत है मेरी ज़िंदगी की, मेरी कमाई है,
इक ज़िंदगी बनाने को, इक ज़िंदगी ने लुटायी है,
मेरा अस्तित्व, मेरी पहचान, जो भी मेरी क्षमता है,
आधार उसका त्याग है, एक देवी की ममता है।

Comments

6 responses to “ममता”

    1. Ritwik Verma Avatar
      Ritwik Verma

      धन्यवाद 🙂

  1. Nandkishor Avatar
    Nandkishor

    लाजवाब

  2. राम नरेशपुरवाला

    Good

Leave a Reply

New Report

Close