कैद

अपनी ही बनाई कैद से रिहाई हो न पाई,
दिल की धड़कन से ही जुदाई हो न पाई,

तरसती रहीं मेरी आँखें देखने को उसको,
ता उम्र यूँही कटी मगर मिलाई हो न पाई,

रिश्तों की चादर तो बहुत मोटी बनाई मैनें,
मगर उधड़ी जब कभी तुरपाई हो न पाई,

कहते रहे कहने वाले छोड़के देखो एकबार,
क्या करूँ मुझसे एकपल ढिलाई हो न पाई,

परिंदों ने काट दी उम्मीदों की डोरी ऐसे के,
राही मन पतंग की कभी उड़ाई हो न पाई।।

राही अंजाना

Comments

4 responses to “कैद”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Wah

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