नग्में

गलतफहमियों की कितनी और किश्तें बाकी रह गईं,
इंसानों की कितनी और देखनी किस्में बाकी रह गईं।।

नज़र-नज़ारे दिल-दिमाग और जुदाई सबपे लिखा मैंने,
कहना मुश्किल है के और कितनी नग्में बाकी रह गईं।।

राही अंजाना

Comments

5 responses to “नग्में”

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar

    बहुत सुंदर रचना ढेरों बधाइयां

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