पुस्तक

बहुत बुलाया मगर वो मेरी कही सुनी सब टाल गया,
प्रेमपत्र जो पढ़े लिखे थे वो आँगन में सब डाल गया,

कौन घड़ी में जाने कब आके घर में दीपक बाल गया,
सूनी मन पुस्तक के भीतर कोरे पन्ने सब खंगाल गया,

रात अँधेरी सहर अकेली साँझ सहेली पूछो न सबसे,
क्यों सहसा “राही” राहों से होकर सब बदहाल गया।।

राही अंजाना

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