कमाल हो तुम!
कैसे जीते हो तुम?
इस जहरीले
नशीले अंदाज़ के साथ।
कभी आग कभी पानी
रोज़ ही लिखते हो एक नई कहानी ।
पल में तोला पल में माशा
मोहब्बत का अक्सर बना देते तमाशा।
तीखे तेवरों की पीछे छुपी मघुर मुस्कान,
ज्वालामुखी सा गुस्सा अंदर मुलायम सी जान।
कभी पकड़ते कभी छोड़ देते हो हाथ,
असमंजस सा दिल में
आज है
कल हो ना हो
ये साथ।
कितना विरोधाभास है व्यक्तित्व में तुम्हारे??🤔
लगता है
हो !
नदी के दो अलग – अलग किनारे।
कभी बहुत मीठे ….
कभी कड़वे लगते हो….
थोड़े -थोड़े झूठे,
थोड़े सच्चे लगते हो
जैसी भी हो बहुत अच्छे लगते हो।
निमिषा सिंघल
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