पहली मुलाक़ात

पहली मुलाक़ात
अनजाने में कुछ यूं टकराए,
किताबे भी हमसे दूर गई।
दो मासूम दिलो की ऐसी,
वो पहली मुलाक़ात हुई।।

सॉरी जो हमने बोला तो,
एक ओर सॉरी की आवाज हुई।
किताबो को समेटने की,
मुस्कराकर फिर शुरूआत हुई।।

उन लम्हों को हम समेट रहे ,
किताब समेटने की आड़ में।
दिल समेटने की फिर भी,
हर कोशिश बेकार हुई।।

किताबें समेटकर तुम उठे
पर खुद को ना यूं समेट सके।
शरमाती हुई नज़रों से फिर
एक और मिलन की चाहत हुई।।

दो मासूम दिलो की ऐसी,
वो पहली मुलाक़ात हुई।।
AK

Comments

9 responses to “पहली मुलाक़ात”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    कविता को पढ़ने से मन में कल्पनाओं का एक दृश्य सा बनता है।
    बहुत सुंदर।

    1. Anuj Kaushik

      धन्यवाद सर, आप लोगो की तारीफ़ ही हम बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।

  2. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    आपकी कविता गतिशील बिंब को धारण करती है! Nice poetical story

    1. धन्याद जी

  3. Geeta kumari

    सुंदर चित्रण

  4. Satish Pandey

    बहुत खूब

Leave a Reply

New Report

Close