हम बंधते ही रहे।

हम बंधते ही रहे,
कभी विचारों तो कभी,
दायरों के धागों से,
सिमट कर रही जिंदगी,
उसी चार कोनों के भीतर,
जन्म से आजतक,
बस दीवारों के रंग बदले,
और लोगो के चेहरे,
कभी इस घर की मान बनी,
कभी उस घर की लाज,
फिर भी बांधते ही रहे हमें,
कभी रिश्तों के धागों से,
कभी आंसुओ की डोर से।।।

Comments

14 responses to “हम बंधते ही रहे।”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar

    गृहस्थ जीवन से जुड़ी ग्रहणी के दुखी जीवन या फिर नारी के केवल चारदीवारी तक सीमित दुखदाई जीवन को प्रस्तुत करती बहुत ही उम्दा कविता

    1. Pratima chaudhary

      बहुत बहुत आभार 🙏

  2. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना

    1. Pratima chaudhary

      धन्यवाद मैम

  3. Satish Pandey

    बहुत सुन्दर तरीके से रिश्तों की बारीकियों पर नजर डाली गई है। बहुत खूब।

    1. Pratima chaudhary

      धन्यवाद सर

  4. Priya Choudhary

    बिल्कुल सही गृहस्ती में ग्रहणी हमेशा बंधी ही तो रहती है👏👏

    1. Pratima chaudhary

      बहुत-बहुत आभार प्रिया जी

  5. Prayag Dharmani

    वाह बहुत सुंदर

    1. Pratima chaudhary

      धन्यवाद सर

  6. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Sunder

  7. Pratima chaudhary

    Thank you

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