कुछ पाया और कुछ खोया

कुछ पाया और कुछ खोया,
क्यों मुझे इस बात पर रोना आया!
क्यों बिछड़ते रहे अपने,
क्यों अजनबियों के बीच मुझे रहना आया!
सपनें टूटते बिखरते रहे,
उसे समेटते दिल भर आया,
कुछ खोया और कुछ पाया।

क्या हुआ जो सब टूटा,
मेरे भीतर के दर्द को, 
कब मैंने समेटा,
जो खोया उसे ठुकराया,
जानकर भी इस बात पर क्यों,
इन आँखों ने सैलाब बहाया।
क्यो मुझे सिर्फ खोना ही आया!
कुछ पाये थे वो लम्हें, वो बातें।
इन सब से दूर अब मुझको जीना आया।
कुछ खोया और कुछ पाया।

Comments

12 responses to “कुछ पाया और कुछ खोया”

  1. Geeta kumari

    संजीदा रचना का सुंदर प्रस्तुतीकरण

  2. Pratima chaudhary

    बहुत बहुत धन्यवाद मैम

  3. Priya Choudhary

    खोना और पाना जीवन के दोनों पहलुओं का बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरण है👏👏👏

    1. Pratima chaudhary

      धन्यवाद प्रिया जी

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही बेहतरीन

    1. Pratima chaudhary

      Thank you

  5. Pratima chaudhary

    धन्यवाद

  6. Pratima chaudhary

    Thank you sir

  7. Deep

    amazing poetry

    1. बहुत बहुत आभार

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