बेटी का घर।

तुम बांध लो अपना सामान,
कुछ भूल ना जाना,
यह सुनते ही,
बेटी का दिल बोला!
यह घर भी,
अपना-सा नहीं लगता।
चार दिन बीत जाने के बाद,
दोहराए जाते हैं यही सवाल!
कि कब आएंगे मेहमान!
कब जाने की तैयारी है!
कुछ पल और रुक जाऊं,
ऐसा दिल चाहता है।
पर ना जाने,
सबके दिल में क्या होता है।
इन रिश्तो में उलझ कर,
समझ नहीं पाती हूं मैं,
कि कौन-सा घर मेरा अपना है।

Comments

12 responses to “बेटी का घर।”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब

  2. Priyanka Kohli

    Nice!!!♡

  3. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बेहतरीन प्रस्तुति

    1. बहुत बहुत आभार

  4. बहुत ही उम्दा

    1. बहुत बहुत आभार

  5. Anonymous

    बहोत सुंदर लिखा है 👌👌👌

  6. प्रतिमा

    Thank you

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