बापू

मनुष्य कहां कोई सम्पूर्ण
जनता की नजर में सब अपूर्ण

दुनियां जिन्हें पूजती बारम्बार
स्वदेश में उनके निंदक हजार
तिनके की तरह ठुकराई सत्ता
कभी भी न पाया कोई भत्ता
निठल्ले करते उनकी बुरी बातें
स्वयं के दामन अच्छाई ढूंढते रह जाते

बापू ने तो दी सौ सौगातें
अंधों को अंशु न नजर आते
दिन रात बैठ कुछ बड़बड़ाते
खुद कहे शब्द याद न रख पाते
शैतान सब में बुराई ढूंढ ही लेते
हंस पुरुष सभी को अच्छा बताते

Comments

4 responses to “बापू”

  1. Suman Kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. बहुत सच्ची और सुंदर अभिव्यक्ति है। जो लिखा वह बिल्कुल सच लिखा है।

  3. Geeta kumari

    बहुत सुंदर रचना , सच्चाई से ओत प्रोत ।

Leave a Reply

New Report

Close