Rajeev Ranjan's Posts

सोंच अलग है

सोंच अलग है याददाश्त विलग है अपनी चाहतों के लिए वो आज हमसे अलग हैं लाखों जमा कर दोस्तों ने सारी उम्र की कमाई गवांई शहर की छोटी जमी के लिए वहीं पे सारी सुविधाएं जुटाई सिसकती रही गांव भूमि बेचारी जिन संसाधनों से जिंदगी बनाई कुछ ने बहुत सी फसलें उगाई जमीनें भी ली और बहुत सारी वहीं जहां की खुशबू ने पढ़ाई उन्हें शहर मंजिलो में पहुंचाई करनी पड़ेगी उनकी पर बड़ाई बचपन ने उन्हें यहीं खींच लाई आकर्षण के तार... »

किसानों का किया है इन्हीं ने तो बुरा हाल

आतंकियों के ठिकाने बदल रहे हैं शिकारियों के पैमाने बदल रहें हैं छिप-छिप के करते थे कभी ठगी जो लालच के उनके आशियाने बदल रहे हैं भोले-भाले को ठगना ही जिनका काम चींटियों की तरह बांबियां बनायी सरेआम सब का ही कर रखा है देखो रास्ता जाम इतने निष्ठुर तो नहीं कहीं होते हैं किसान बेईमानों की प्रत्यक्ष है पहली बार मंडली लूट का पता बता रही हैं तन जमी चर्बी नहीं है ये हितकारी न ही कोई किसान फुटपाथ पे ले आई इन्... »

मैं-मैं व तूं तूं

सारे व्यापार को तेरा आधार संबंधों में भी तुझसे ही है प्यार तुझमें ही सब और सबमें प्रकट तूं फिर भी सब में क्यूं भरा मैं मैं व तूं तूं पल पल के मीत जाते बीत प्यार सच्चा पर अंतराल का गीत नीरस जीवन में लाता मधुरता संगीत प्रियतम तेरे आशीष संबंध सुख पाते जीत तुझसे ही बने हैं सारे रूप नेह आगार भरे कितने अनूप सुंदर जो थे कैसे बन जाते कुरूप प्रभु तुझसे ही तो सब की छांव धूप अंत तुम्हीं तुझमें विश्राम तुझमें... »

रिश्ते क्षितिज की तरह

रिश्ते क्षितिज की तरह मिले से प्रतीत होते हैं बंधन में बंधे लोग कब इक दूजे करीब होते हैं आकर्षण करीब लाता है विकर्षण भी खूब भाता है पास में टकराव है लेकिन दूरी से ही सच नजर आता है लम्बी सी कतार है लेकिन इक तरफ झुकाव है लेकिन आगे को ही स्नेह बरसता है पीछे वाला अक्सर तरसता है »

दीप जलाओ

दीप जलाओ और बस दीप ही जलाओ पटाखे जलाकर प्रकृति को मत चिढ़ाओ मन के अँधेरे को मिटाकर समझ का दीपक जलाना मकसद यही है दिवाली का जीवन को रौशनमय बनाना शांत करता वातावरण स्वच्छ होता जाता मानस मन निर्मल शांत रात्रि को तुम कोलाहल की न भेंट चढ़ाओ प्यार से जलते हुए दीपक साथ हमें रहना सिखाते सुख की छांव हो या दुःख की तपन एकता को बढ़ाते पटाखे की कोलाहल से शांत मन भी खीझ जाते प्रदूषित हुई धरा को तुम और प्रदुषण से न... »

ये कैसी मानव जाति है

अच्छाईं भाती है फिर भी जुबां गलत बोल जाती है ये कैसी मानव जाति है सामान तो हरदम है पास जब हो कुछ बहुत खास तभी तो जरूरत आती है अंतर तो सर झुकाता है बाहर कुछ और दिखाता है सरलता को क्यूं छुपाती है आसमान पे थूकने को आमादा है अपना काम पड़ा रह जाता है फिर गुस्सा औरों पे दिखाती है समय जैसे ख़ुद का गुलाम हो जरूरी काम कल पर टाल दो ब्यर्थ औरों पे झल्लाती है हर आरंभ का है अंत यहां आराम से मन ऊबता कहां जमे तन... »

हे प्रभु प्रीतम

मार्गदर्शन से तेरे होते सब काम हो जब थकान तुझ में विश्राम हे प्रभु प्रीतम हे दया निधान आनंदित रहूं सदा करूं तेरा ध्यान सुबह रहे तेरा नमन कर्म हो तेरा सिमरन तुझ से विलग हो सिहरन सदा रहो देव मुझे स्मरण रिश्ते तेरे सम्मान रहे कृतियों के लिए आदरभाव रहे अच्छाई पर ही ध्यान रहे नहीं खुद पर अभिमान रहे »

इक हद होती है

हर बात की आखिर इक हद होती है सच लगता था कभी झूठ आज साबित हुआ अँधेरे में थी जिंदगी उजाले पर काबिज हुआ भविष्य देखने का दावा अब तो खोखला पड़ा जिसकी हथेली थी खाली वो ही सिंघाशन चढ़ा लगता था कभी जंगलराज खत्म न हो पायेगा इक चायवाला आसमा को जमी की हकीकत दिखायेगा अब तो लगता असंभव कुछ भी नहीं है यहाँ कुछ भी मुमकिन है ये है अपना हिंदुस्तान उम्मीद की किरण जागी सत्ताधारी दहशत में है सरकारी कुर्षीधारी की अकड़ लम्... »

दुनियां की पुरानी आदत है

नन्हीं कलियों से आस लगाना दुनियां की पुरानी आदत है तनहा मुंह मियां मिट्ठू रहकर खुशफहमी पालना आदत है संगत से खुद को बचाते जाना इंसानों की अब तो फितरत है कंधा से कंधा मिलाते थे जो अकेलेपन के शिकार हुए डाक्टर का दर्शन करते रहे प्रार्थना की ही इनायत है चुनाव के मौसम आते ही फिर दर्शन को बेताब हुए परिणाम आते ही उनसे फिर वही पुरानी शिकायत है »

बंजर पे बसेगी फिर बहार

बे-कार हूं बे-रोजगार नहीं आदतों का शिकार नहीं शौक से नहीं परहेज मुझे तेरी तरह शौक का गुलाम नहीं इक सुई का किया आविष्कार नहीं उसे हर नई खोज की दरकार है मेरी जरूरतों का है ईल्म मुझे तेरी तरह दुष्-स्पर्धा का बीमार नहीं मेरे अपनों को जो सुख हासिल नहीं उसका न लेना है हमेशा स्वाद मुझे तेरे सुख के लिए खड़े हैं कयी महल बाबा की झोपड़ी की मुझे दरकार है भरा आंगन ही था भाता मुझे अकेलेपन का उपहार तूने दिया अब ... »

अकेले रह जाते हैं

सुंदरता के आकर्षण में बंध कोई इतना कैसे भा जाता है ईश्वर से मांग को हो धन्यवाद प्रार्थना से जीवन में लाता है पाकर इच्छित साथी खूब इतराता है अपनों को ठुकरा उसे अपना बनाता है नये रिश्ते जुड़ते ्संबंध छूट से जाते हैं उमंग में लेकिन महसूस कहां कर पाते हैं जीवन पाते खोते आगे बढ़ता जाता है सुख दुख का आना जाना लगा रहता है इक दूसरे के आशाओं को समझते हुए जिंदगी भी इक समझौता सा लगता है शौक सभी ने पाले थे जो... »

संतान

माया को रचा हमने प्यार का दीप जलाया जिनका था सहारा हमें उन्हें ही किया बेसहारा गौ माता को पूजते तब तक जब तक अमृत धार बहाती यही स्वार्थ की अंधी भक्ति अपनों से हमें दूर कर जाती रिश्तेदारों से सम्बन्ध तभी जब तक धन वे लुटाते कार्य सिध्ध होते ही अपने जाने लुप्त कहाँ हो जाते फिर से ये निस्तेज शक्ल उनको तभी हैं दिखाते जब नयी वासना के लिए धन थोड़े कम पड़ जाते अपने भी बन जाते सपने ये शौख जिन्हे हो जाते अहसान... »

बोच बसंत

गुमनामी में गुजर गयी जिंदगी फिर भी न शिकायत कभी की जिनके लिए जी तोड़ मेहनत की उनकी बेरुखी ही हरदम सही फिर भी उदासी न चेहरे पे दिखी हंस मुस्करा कर सबसे कुछ कहना आदत थी जिनकी हिल मिलकर रहना बच्चों को आदर दे बड़प्पन का भरना अचरज है ऐसे पुरुष कैसे बेकार हो जाते हैं गुमनामी का शिकार हो क्यों विदा हो जाते हैं समाज में कुछ लोग जोंक से होते हैं मेहनत करा खाते मजदूरी कम देते हैं काम से मतलब सेहत से न पर की... »

बेटी से ही तो दुनियां

बचपन से संवेदनशील बच्चों में होशियार सब करते हुए भी लक्ष्य पर रहता ध्यान हरदम ही समझदार फिर भी क्यूं शिकार शायद घर में ही रहकर सबकी सेवा ही कर-कर खुद को समझती कमजोर मन से होती रहती बीमार समझती खुद को लाचार शायद इसलिए वो शिकार अथक जिसकी सेवाये निकम्में उसे सताये कैसी विडम्बना है करनेवाला ही बड़ा है रक्षा में उसकी आयें उसे मिलकर समझायें तूं ही तो आदि शक्ति तूं न किसी से कमजोर बेटी से ही तो दुनियां न... »

बेटियां संभालती है

सपनों में आ जाओ फिर मुझे याद दिलाओ मेरा वो स्वार्थी मन तेरा वो भोला बचपन अनजान मेरी हर शैतानी कितनी थी तुझे परेशानी तेरा बर्दाश्त करते रहना हैरानी में आज भी डालती है वो खजूर के पेड़ ऊंचे पत्थर का सर पे गिरना मेरे डर के कारण तेरा दर्द सह चुप रहना याद मुझे है अब भी रो रो तेरा सो जाना फिर भी तेरे दर्द को भुला अपना बचाव करते जाना छोटी होकर भी बेटियां बड़े को सदा संभालती है स्वयं कष्ट का अन्देखा कर देश... »

इक ज़माना था

इक जमाना था लोग प्यार करते थे पर बताते न थे इक जमाना है प्यार का तो पता नहीं पर रोज ही जताते हैं प्रेमी के सुख दुःख का कितना ख्याल था बुरा न मान जाये कही हर समय ही ध्यान था उम्र गुजर जाते पर बताते हुए डरते थे कितने जिंदादिल थे दुःख सहकर ख़ुशी देते थे महबूब की चाहत अगर कोई और हो उसकी चाहत का भी ख्याल करते थे उनकी बड़ी गलतियों का भी न दिल में मलाल रखते थे अब तो ये आलम है की अपनी फिक्र में ही सब डूबे ह... »

अपनों से दूर

अपनों से दूर हो हर इंसान खुद को भी भूल जाता है अपने करते हैं नित शिकायत पराधीन कहां सुख पहुंचाता है पारावत की तरह हर सन्देशें पर की अंजाने को पहुंचाता है अपने रहें आश में तड़पते पालक को भी ठुकराता है बीती अपनों पर तकलीफें जो स्वयं भी भुगतना पड़ जाता है बच्चों की जनक से करता शिकायत निज करतूत भी न याद आता है दुख बांटने वाले को ही मिलता है किसी के लिए नियम न बदलता है जिंदगी बीता दी जब सारी शायद जीना ... »

सुनियोजित आयोजन

हर एक के लिए सुरक्षित सुनियोजित आयोजन फिर भी क्यूं हम करते रहते भविष्य का प्रबंधन दूरदर्शिता की हुईं हैं सभी को बिमारी वर्ष अंत का आरक्षण शुरू में करायी चहुंओर बंदी से हुई है कितनी धन की हानि आदत ने कब कहां की है मन की गुलामी लोगों को अनावश्यक घूमने की आदत स्वयं के साथ औरों के काम में है बाधक समय के साथ बढ़ी भेड़चाल की आदत शिक्षक प्रकृति ने सिखाया दूरी है इबादत जितनी है सीटें उतना ही हो आरक्षण बचे... »

सुंदरता सुख देती है

सुंदरता सुख तो देती है पर साथ दुख भी आता है गुलाब के फूलों के साथ कांटा स्वयं चला आता है नये आकर्षण से बंधकर मन को आराम तो आता है काम का बोझ भी बढ़ता है इंसान पूर्ववत हो दुख पाता है आकर्षण से मुंह मोड़ने पर ईच्छा दबी रह जाती है अनुभव कर आगे बढ़ सकते हैं प्रचंडता में अधिक सताती है »

सच सदा से कड़वा होता है

सच बोलने को हिम्मत चाहिए मीठा झूठ सभी को भाता है सच सदा से कड़वा होता है मधुमेह वालों को भी न सुहाता है तब रावण एक अकेला था हर घर अब रावण का मेला है पागल खाने में भी जगह कहां जहां मुफ्त में भोजन मिलता है मुश्किल में हंसने वालों के लिए इक जगह वहीं बस दिखता है सुख मिलने पर भी लोग हंसते कहां याद दिलाते तो कष्ट से हो पाता है मुस्कुराने में जो भी मेहनत लगती चेहरे पर स्पष्ट नजर आ जाता है »

अचरज है कैसे

अचरज में हूं मैं न जाने कब से भारी भरकम आदमी की बोली हल्की कैसे हल्के आदमी की बातों में वजन है कैसे चींटियां आंख बिन चढ़ती दुर्गम पहाड़ों पर आंखवालों की कमर टूटती बिस्तर पर कैसे सुंदरता झुकाती है अकड़ वाले पहाड़ों को भी पहाड़ी तन निर्मित न करते इक फूल भी कैसे दूध दही की नदियां बहाते हैं जो नित निज घर फीके पेय की घूंट को हर दिन गले लगाते कैसे बड़ों की सीख पल भर भी न सिर टिकने दिया बच्चों को वही सिख... »

हम वहीं रह जाते हैं

दिन गुजर जाते हैं हम वहीं रह जाते हैं नये दिनों की तरह कहां नये हो पाते है पुराने जख्म मिले कहीं क्यों न भुला पाते हैं आये नये जो पल हाथ बीती बातों को दुहराते हैं आशा रख कर औरों से हर दिन क्यूं जलते जाते हैं भूत के बोए बबूल को भूल आम की चाहत किये जाते हैं आंखें बाहर को खुलती है स्वयं का अनदेखा करती है विश्वास खुद पे होना चाहिए औरों पे भरोसा क्यूं करती है आज जो अहं में डूबे हैं कल पर अहं को झेलेंगे... »

बापू

मनुष्य कहां कोई सम्पूर्ण जनता की नजर में सब अपूर्ण दुनियां जिन्हें पूजती बारम्बार स्वदेश में उनके निंदक हजार तिनके की तरह ठुकराई सत्ता कभी भी न पाया कोई भत्ता निठल्ले करते उनकी बुरी बातें स्वयं के दामन अच्छाई ढूंढते रह जाते बापू ने तो दी सौ सौगातें अंधों को अंशु न नजर आते दिन रात बैठ कुछ बड़बड़ाते खुद कहे शब्द याद न रख पाते शैतान सब में बुराई ढूंढ ही लेते हंस पुरुष सभी को अच्छा बताते »

बेटी

हर घर की खुशी व रौनक है बेटी उसी से दुनियां शुरू व खत्म होती किलकारी सब को हर्षा जाती हर मात पिता को ही भा जाती परिवार एकता का कारण जो जीवन जीने की प्रेरणा है वो— दो घर की सुंदरता उससे ही है बेटों का संबल भी वो ही तो है फिर भी कमजोर कैसे बन जाती कैसे दुर्जन का शिकार वो हो जाती सबला को समाज ने अबला बनाया ममता का सबने ही फायदा उठाया शक्ति साहस का वर्षों से प्रतीक बेटी फिर भी उसे बचाने की जरूरत... »

सुधार निशदिन

बहुत ही है मुश्किल औरों में सुधार लाना बेहतर है खुद को ही निश दिन सुधारते जाना काम बहुत है सारे हर दिन पांव पसारे कुछ कर नाम कमाते तो कोई कल पर टारे दिन यूं ही गुजरते चले जाते कुछ फुरसत कहां कभी पाते कई आराम से नित न अघाते कुछ उन्हें देख चिंतित हो जाते बीमारी खड़ी मुंह बाए चंचल को कम ही सताये आलसी शिकार हुआ जाये कारण कब समझ में आये परिवार के ही दोनों अंग इक आगे नित ही बढ़ाए इक बिना कुछ किये ही कर्... »

नम्रता

नम्रता ही तो है आभूषण हर्षित करता है सबका मन जीवन में कोई अवरोध नहीं प्रगति भी रुकता है कहीं कर्महीन का सहारा भाग्य उत्साही का तो हर दिन सौभाग्य — सब कुछ वह तुरंत ही पाता औरों को भाग्य समझ आता लगन से होता जन जागरण साधारण भी बनता प्रतिभावान विश्वास शक्ति और महानता का रास्ता अविश्वासी को नहीं इससे वास्ता न सीखने से इंसान बूढ़ा बनता जाता सीख सीख बूढ़ा भी होता जवान हर विचार तो है इक स्वप्न कर्म से... »

निरंतर

दुख के क्षणों में जो शख्श ऊबता नहीं सुख के क्षणों में अपनो को भूलता नहीं पुरुषों में है सदियों से ही अज्ञानता गलत संगत से निज ज्ञान भी ढका औरों की बात मन में नित भरते हैं न चाहते भी कई गलतियां करते हैं कुछ निर्भर करता बेटी की ईच्छा पर मात पिता भी बच्चों को भूल पाता कब रश्म तो सदियों से निरन्तर चलता आता कंधा मजबूत पर ही भार डाला जाता »

संतान

हर संतान है विशेष यहां अवसर भी भरमार है मालिक की नई रचना पुराने से हमेशा खाश है फिर भी हर पिता को पुत्र में कमी नजर आता है मंदिरों में सर झुका पाता जिसको उस ईश्वर को ही नित सताता है धार्मिक खुद को बतलाते हैं संदेश पकड़ न पाते हैं गंगा के पास जब जाते हैं उसका अंश ही तो लाते हैं मानसिक क्षमता दुर्बल शायद बीती बातों को भुलाते हैं इसलिए हर पिता ही लगभग अपने नौनिहालों को सताते हैं »

ऐतवार

समय के साथ समझ बदल जाती है चाहने वालों की चाहत बदल जाती है प्यार करने वाले गलतियां सहित अपनाते हैं भरोसा है जिसपर कभी तोहमत न लगाते हैं ऐतवार हो तो प्यार हो ही जाता है दर्द लेकर भी ये कष्ट से बचाता है ऐतवार मां जैसा कहां है किसी में अद्वितीय चीज है इस जग जहां में आखिरी सांस तक निज संतान पर ऐतवार करती है न शक है जिस पर ऐतवार हो तो कीचड़ कमल बन जाता है चाय केतली छोड़ विश्व सिंघासन पाता है »

परिभाषा

प्रेम की परिभाषा नहीं जानते वो ही बढ़ चढ़ इसे बखानते चाहतें जो रही कभी हमारी वही चाहत रही होगी तुम्हारी इसलिए कभी मैं ऊब जाता अनमना सा किया जब पाता समाज ने इक बंधन तो बांधा इसे तो हमेशा क्रंदन ही भाया रिश्तों के नाम पर हर हमेशा वेदी चढ़ा स्वयं हित ही साधा समर्पण बिना हर प्रेम अधूरा चाहकर भी न उत्पन्न हो पूरा स्वयं उत्पन्ना जिसकी नियति हो प्रयत्न से भला कैसे फलित हो »

बचपन

जीवन की अवस्था तीन सही बचपन का कोई जवाब नहीं आनंद भरा रहता तन मन पुलकित होता हरेक का संग शिशु मुख लगता प्यारा प्यारा हर अंग भाता न्यारा न्यारा मुस्कान हो या फिर हो क्रंदन पलक लपकता रहता ही छवि जीवन की अवस्था कई सही बचपन का कोई जवाब नहीं हर नयन में शिशु का आकर्षण न्योछावर हो जाता जन मन नन्ही बांहो में मां समा जाती पूर्णता का अहसास करा पाती अपनेपन का कोई स्वार्थ नहीं हर जीव से रहता लगाव तभी जीवन की ... »

पशुता

चीनियों को चीनी की बीमारी चींटी की तरह रेंगते रहते खाने तक की है अक्ल नहीं पशु खा पशुता ही प्राप्त कर रहे अंत करना उनका नहीं मुश्किल भालू चूहे बन्दर की जरूरत है कोरोनावायरस फैलाया है उन्होंने हैजा वाले शस्त्रों की जरूरत है विश्व के लिए चीन पाकिस्तान खतरा इनके उन्मूलन की आवश्यकता आ पड़ी जल्द ही विश्वशोध ढूंढ लेगा हर इनका मुश्लिम आक्रांताओं से होगी मुक्त धरती »

अनिवार्यता

अध्य्यन-अध्यापन का बढ़ता व्यवसायीकरण राष्ट्र के पतन व जनता के घुटन का है कारण अत्याचार कोई जब हद से अधिक बढ़ जाता है प्रकृति तब बचने का कोई अवसर दिखाता है शिक्षा जन जन की जब मूलभूत आवश्यकता फिर हर परिवार इसके कारण क्यूं सिसकता अब हरेक के जेब में ही है कैद जब दूरदर्शन मुक्त होता जा रहा हर जगह सब अनुशासन इतने शिक्षालयों की अब तो जरूरत है कहां विश्वविद्यालय का भी है अब तो विकास थमा हर चीज के लिए है ज... »

जल-जीवन

जिंदगी को कहीं कैद कहीं आजाद देखा फिर भी न बदलता उसका स्वभाव देखा बुंद बनकर आसमां से लहराते आते देखा कयी बोझिल चेहरे को पल में हर्षाते देखा चूल्हे पर जलकर फिर आसमां में जाते देखा प्यालों में जा तन मन की थकान मिटाते देखा स्वयं को जमाकर औरों पे शीतलता लुटाते देखा जिनके तन जले उन पर मरहम बन छाते देखा पर हित लुट जाने वाले को नित भोजन बनाते हैं तब भी जीवन भर स्वार्थि बन सांसों को घटाते देखा »

Kahte the log

समय नहीं समय नहीं यह कहते थे लोग, लगता था यह ज़िन्दगी बन गयी एक बोझ. जीवन यूँ ही काम करते हुए बीत जायेगा, अपना बस नाम का ही अपना रह जायेगा. समय एक सा ही नहीं रहता है हरदम, इसी आस में बीत जाता हर एक का जीवन. सपनो को संजोये ही चला जाता हर मानव, गुलाम बनाये रहता नौकरशाही का दानव . हर घटना आती है एक नया सन्देश लिए, अपनों के साथ भी जी एक नया उपदेश दिए. सुख हो या दुःख जी लेंगे ज़िन्दगी का हर पल, मत हो उदा... »

प्रकृति

प्रकृति की सुन्दरता इसलिए है कायम इसे कभी किसी से इश्क नहीं होता न ही ये कभी किसी के लिए रोता इसलिए शायद सबका प्यारा होता चांद और सितारे सदा थे और रहेंगे पेड़ पौधे सारे सदा थे और भी सजेंगे आवागमन चक्रीय न थमा है थमेगा दुनियां में हरियाली सदा मौजूद रहेगा इंसानों ने कभी न फिक्र की है जिसकी जरूरत से ज्यादा नष्ट की संपदा सृष्टि की चेतावनी तो सदा मिलती रही है लेकिन छोटों ने अब सीख अपमान की है बड़ों की »

अक्सर

जीवनदायिनी चीजें ही तो अक्सर प्रचूरता में जिंदगानी ले लेती है अग्नि नित सब का चूल्हा चलाती भोजन को कितना मधुर बनाती अधिकता में स्वाद को ही मिटाती अनजाने में घर तक भी जलाती जल बिन कितना तड़पे हैं मछली सजीवों की पानी हीं तो है जिंदगी अधिकता में कितना रौद्र रूप धरती कितनों का संसार हर साल सूना करती वायु से है प्रत्येक प्राणी का जीवन तूफानों ने बदला हर जगह का मौसम इनसे ही तो होती है जिंदगी की गिनती श्... »

पृथ्वी

पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाकर प्रेम दिखाती है बिन मांगे अपनी झोली हमेशा ही भरा पाती है हर चीज समय से जुड़ी है प्रत्येक जगह यहां जलीय चक्रीय प्रवृति से भरा है सारा ही जहां इसकी तरह ब्रह्मांड की हर चीज ही है गोल मानव मन उलझ जाता पर न पाता उसे तौल स्वाभाविक रूप से सक्रिय है प्रकृति जिसकी हर सजीव में झलकती है गतिशीलता भू की अपने अस्तित्व के कारण ही हम सब हैं जुड़े समय कब है थमा हमारा हर छोर इसपे खड़ा यह... »

प्रतिस्पर्धा

एक ही प्रतिस्पर्धा में अलग अलग स्वाद मिलते हैं इसी से पर मुश्किल से मंजिलों के ख्वाब पलते हैं लक्ष्य है निर्माण कि स्वतंत्रता सब अनुभव कर सके बीमारी गरीबी और अज्ञानता भूत की बात बन सके चैन से बैठें नहीं जब तक की लक्ष्य हासिल न हो गंतव्य तक पहुंचें कि सब के लिए पथ मुमकिन हो सोंच से ही बनते तो महान चाहे लोग हों या कि देश अच्छी सोंच से ही हो पाता सफल कोई भी काम नेक »

आपदा

जब समझ न आता ऊंच नींच , अहंकारी हो जाता तन मन अग्रज हो की अनुज या पूज्य , व्यवहार सभी से होता सम निर्जीव सजीव सभी को दुखी , करता रहता ये मानव जीवन संस्कार सभ्यता का पाठ पढ़ाने , आपदा तभी तो आती है वाणी की मधुरता न जाने , मानव की कहाँ खो जाती है हरकत उसकी कब कहाँ किसे , सुख शीतलता पहुँचती है संपर्क में आने वाली वस्तु , भी संदूषित हो जाती है संस्कार सभ्यता का पाठ पढ़ाने , आपदा तभी तो आती है अपनी निर्म... »

दिल्ली

हॉस्पिटलों का शहर है दिल्ली फिर इतने बीमार क्यों जनसँख्या बिखरी हमारी इमारतों का वहीँ भंडार क्यों यात्रायें चलती रहती आवागमन कभी थमता नहीं आमदनी का श्रोत बनी जनता ही हर जगह तो नहीं साजिशों का कैसा दौर है जिसमें परेशां है हर कोई लक्ष्मी भण्डार बन रहा किसी का घर बैठे बैठे ही स्वास्थ्य की खातिर लम्बी यात्रा कर लुटाते सब कुछ फिर भी हाथ मल कर रह जाते पास आ पाता न कुछ महामारी ने दिखलाया है स्वास्थ्य व्य... »

Kanhaiya

माखन निकाल रही यशोदा मैया ध्यान में है सिर्फ श्याम कन्हैया भूखे जब होंगे बाल गोपाल तब दूंगी उन्हें माखन निकाल अभी रख देती हूं इसे संभाल मन में है हरदम उन्हीं का ख्याल हरि भी देख रहे मां को छुप-छुप के माखन तो प्रिय मेरे सारे सखाओं के देर लगेगी मां को अभी थोड़ा इसलिए चल दिए पड़ोस में चुपके दही की कमी नहीं है गोकुल में श्याम बसे जन-जन के मन मन में मनमोहक कृत्य सखा संग माधव के मन में गोपियां रख सकी न ... »

माधव

माखन निकाल रही यशोदा मैया ध्यान में है सिर्फ श्याम कन्हैया भूखे जब होंगे बाल गोपाल तब दूंगी उन्हें माखन निकाल अभी रख देती हूं इसे संभाल मन में है हरदम उन्हीं का ख्याल हरि भी देख रहे मां को छुप-छुप के माखन तो प्रिय मेरे सारे सखाओं के देर लगेगी मां को अभी थोड़ा इसलिए चल दिए पड़ोस में चुपके दही की कमी नहीं है गोकुल में श्याम बसे जन-जन के मन मन में मनमोहक कृत्य सखा संग माधव के मन में गोपियां रख सकी न ... »