मातृदिवस

मां तूं है ममता का सागर करुणामयि अमृत की गागर श्रृजनता अतुल्य अपरम्पार तेरा ऋणि ये सारा संसार सुमन सी प्रफुल्लित चंचल सन्मिष्ठा सी मधुर…

हे हनुमान

मंगल मूर्ति हे हनुमान बारम्बार तुम्हें प्रणाम तुझसे संभव सारे काम कष्ट हटे मन को आराम सेवा का संचार तुम्हीं हो जग का सद्व्यवहार तुम्हीं…

तेरे जन्मदिन से हो फिर नया विहान

मर्यादा की पराकाष्ठा सद्गुणों के धाम हे पुरुषोत्तम तुम्हें बारम्बार प्रणाम अवतार पूर्व मनुष्यता थी विकल ज्ञानी ध्यानी सारे संत थे विफल अत्याचार मुक्ति की…

कश्मकश

समझाना चाहते थे हम उनको क्या और वे समझे हैं देख लो जी क्या ये देख के लगता है यूं कश्मकश में चुप रहना ही…

अमृत कलश

स्वर्णिम किरणों के रेशमी तार मन सबके मनके जैसे वो हार कितना उसको है मुझसे लाड़ सुर संगीत लिए आता सबके द्वार सुनते हैं ऊज्ज्वलता…

यश

यूं ही नहीं मिलता किसी का साथ ये तो जन्मों जन्मों की अधूरी आश खेल कूद कर संगी साथी के संग खबर न हुई कब…

हर्षित रहो

काम होता अवश्य मन में हर्षित रहो सबको शीष नबा कर्म में रत रहो आशीर्वाद से ही जीना होता आसान बड़े सत्य वही जिन्हें छोटों…

कचहरियां

अप्रमेय तथ्य है सदा से ही अविकल्प जीवन में शांति उन्हीं से पर है कायम प्रमाण सदन तो कुंठा से ही भरे हुए जीवन अवसाद…

सोंच अलग है

सोंच अलग है याददाश्त विलग है अपनी चाहतों के लिए वो आज हमसे अलग हैं लाखों जमा कर दोस्तों ने सारी उम्र की कमाई गवांई…

दीप जलाओ

दीप जलाओ और बस दीप ही जलाओ पटाखे जलाकर प्रकृति को मत चिढ़ाओ मन के अँधेरे को मिटाकर समझ का दीपक जलाना मकसद यही है…

संतान

माया को रचा हमने प्यार का दीप जलाया जिनका था सहारा हमें उन्हें ही किया बेसहारा गौ माता को पूजते तब तक जब तक अमृत…

बोच बसंत

गुमनामी में गुजर गयी जिंदगी फिर भी न शिकायत कभी की जिनके लिए जी तोड़ मेहनत की उनकी बेरुखी ही हरदम सही फिर भी उदासी…

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