खड़ी बेरोजगारी है

नारे फिर लगाना
शक्ल देखो गौर से मेरी,
मुल्क का आक़िबत हूँ
आज हालत है बुरी मेरी।
खड़ी बेरोजगारी है
सामने पर स्वयं देखो
लगा नारे मेरे कानों में
यूँ पाषाण मत फेंको।
शब्दार्थ –
आक़िबत – भविष्य
पाषाण – पत्थर

Comments

6 responses to “खड़ी बेरोजगारी है”

  1. बेरोजगारी पर शानदार कविता

  2. Geeta kumari

    बेरोज़गारी का समसामयिक यथार्थ चित्रण । बेहतरीन रचना

  3. बेरोजगारी पर उत्तम रचना वाह

  4. बहुत बढ़िया waaah

  5. वाह वाह बहुत खूब

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