***राम कसम***

रह जाते हैं ख्वाब अधूरे
झूठे-मूठे वादों से
जब से तूने ये दिल तोड़ दिया
डर लगता है सबकी बातों से
चाँद ताक कर कटती हैं
जब से मेरी रातें
*राम कसम’* तबसे मुझको
डर लगता है रातों से…

Comments

6 responses to “***राम कसम***”

  1. Rishi Kumar

    वाह👌✍
    ❤❤❤

  2. Geeta kumari

    वाह, बहुत ख़ूब

  3. Satish Pandey

    बहुत खूब, बहुत ही उम्दा भाव, सरल व सहज भाषा व शिल्प

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