सुन्दर सा वो हिंडोला था,
जिसमें बैठ के ,
मन मेरा डोला था
सुन्दर सी वादियां हैं
सुहाना सा समां है,
बढ़ती ही जा रही हूं
डरती भी जा रही हूं,
ना नभ है, ना धरा है
ये पांव कहां धरा है
तारों के सहारे,
चलती ही जा रही हूं
कब तक चलेगा ऐसे,
सफ़र सुहाना सा ये
*****✍️गीता
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