Geeta kumari's Posts

जीवन की पहेली

मैं दौड़ती ही जा रही थी, ज़िन्दगी की दौड़ में। कुछ अपने छूट गए इसी होड़ में। मैं मिली जब कुछ सपनों से, बिछड़ गई कुछ अपनों से। दौड़ती जा रही थी मैं, किसी मंज़िल की चाह में, कुछ मिले दोस्त, कुछ दुश्मन भी मिले राह में। कभी गिरती कभी उठती थी, इस तरह मैं आगे बढ़ती थी। कभी चट्टाने थी राहों में, कभी धधकती अनल मिली। कहीं-कहीं दम घुटता था, कहीं महकती पवन मिली। यूं ही तो चलता है जीवन, कैसी यह जीवन की पहेली।... »

*नेकी*

नेकी कर दरिया में डाल, यह कहावत बड़ी कमाल। आओ सुनाऊं एक कहानी, नेकी करने की उसने ठानी। उस ने नेकी कर दरिया में डाली, वह नेकी एक मछली ने खा ली। नेकी खाकर मछली हो गई, खुशियों से ओत प्रोत। नेकी कर और बन जा, किसी की खुशियों का स्रोत।। _____✍️गीता »

मुस्कुराना

मुस्कुरा कर बोलना, इन्सानियत का जेवर है। यूं तेवर न दिखलाया करो, हम करते रहते हैं इंतज़ार आपका, यू इंतजार न करवाया करो। माना गुस्से में लगते हो, बहुत ख़ूबसूरत तुम पर हर समय गुस्से में न आया करो। बिन खता के ही खतावार से रहते हैं हम, यूं न हमें डराया करो। एक दिन छोड़ देंगे हम ये जहां, फिर ढूंढोगे तुम हमें कहां। तो मुस्कुराओ जी खोलकर, कह दो जो कहना है बोलकर। हमको यूं न सताया करो, मुस्कुराना इन्सानियत... »

जीवन

सब्र की जरूरत है, समय सब कुछ बदलता है। परिवर्तनशील इस संसार में, सांझ तक सूर्य भी ढलता है। जीवन में श्रेष्ठ कर्म करो, यह रामायण सिखाती है। द्वेष,बैर भाव और लालच को, महाभारत दर्शाती है। महाभारत ग्रंथ ने इनका, दुखद परिणाम दिखाया है। श्री कृष्ण ने दे उपदेश गीता का, जीवन जीना सिखाया है।। _____✍️गीता »

वह बेटी बन कर आई है

एक युवती बन कर बेटी, मेरे घर आई है। अपने खेल खिलौने माँ के घर छोड़कर, हाथों में लगाकर मेहंदी और लाल चुनर ओढ़ कर मेरे घर आई है। छम छम घूमा करती होगी, माँ के घर छोटी गुड़िया सी झांझर झनकाकर, चूड़ियां खनका कर, मेरे घर आई है। बेटी बन चहका करती थी, बहू बन मेरा घर महकाने आई है। एक युवती बन कर बेटी, मेरे घर आई है। अपनी किताबें वहीं छोड़कर, उन किताबों को भीतर समाए मेरे पुत्र के नाम का सिन्दूर माँग में सजा... »

राधा मोहन गीत

कान्हा ने बोला राधा से, तेरी ये अखियां कजरारी। मन मोह लेती हैं मेरा प्यारी, इठलाती फिर राधा बोली। मोहन तुम्हारी मीठी बोली, हर लेती है हिय को मेरे, भागी भागी आती हूं सुन, मीठी तेरी बंसी की धुन। कान्हा बोले मृदुल भाषिणी, सुन मेरी सौन्दर्य राषिणी तुम हो सदा ही परम पुनीता, तुमने मेरा मन है जीता। तुम हो मन की अति भोरी, तुम सबसे प्रिय सखि मोरी।। ____✍️गीता »

शान्ति का पथ

क्रोध हर लेता है मति, करता है तन-मन की क्षति। क्रोध की ज्वाला में न जल, क्रोध तुझे खाएगा प्रति पल। क्रोध का विष मत पीना, मुश्किल हो जाए जीना। छवि नहीं देख पाता है कोई, कभी उबलते जल में। सच्चाई ना देख सकोगे, कभी क्रोध के अनल में। क्रोध में होगी तबाही, शान्ति में ही है तेरी भलाई। शान्ति का पथ अपना ले, शान्ति की शक्ति पहचान शान्ति में ही सुख मिलेगा, शान्ति में है तेरी शान।। _____✍️गीता »

स्नेह की संजीवनी

जब हर ओर निराशा हो, आशा की किरण दिखा देना। जब राहों में हो घोर निशा, दीपक बन कोई राह दिखा देना। कोई साथ दे ना दे, तुम अपना हाथ बढ़ा देना। दर्द में जब कोई तड़प रहा हो, स्नेह की संजीवनी पिला देना। बनकर पथ प्रदर्शक किसी का, उसके जीवन में उल्लास जगा देना।। _____✍️गीता »

लालच वृद्धि करता प्रति पल

जंगल का दोहन कर डाला, इन्सान तेरे लालच ने। कुदरत के बनाए पशु-पक्षी भी ना छोड़े, इन्सान तेरे लालच ने। हाथी के दांत तोड़े, मयूर के पंख न छोड़े मासूम से खरगोश की नर्म खाल भी नोच डाली, इन्सान तेरे लालच ने। चंद खनकते सिक्कों की खातिर, यह क्या जुल्म कर डाला। सृष्टि की सुंदरता का अंत ही कर डाला इन्सान तेरे लालच ने। कितना भी मिल जाए फिर भी, लालच वृद्धि करता प्रति पल। सुंदर पक्षी ना शुद्ध पवन कैसा होगा अपन... »

क्या पता ..

किस मोड़ पर मंज़िल कर रही है इन्तज़ार, क्या पता … किस राह में हो जाए दीदार-ए यार क्या पता… जीत एक रास्ता है, हार एक अनुभव है जीवन का। कल क्या हो, किसी को क्या पता… ____✍️गीता »

वह एक मज़दूर है

भवन बनाए आलीशान, फ़िर भी उसके रहने को नहीं है उसका एक मकान। झोपड़पट्टी में रहने को मजबूर है हाँ, वह एक मज़दूर है। मेहनत करता है दिन रात, फ़िर भी खाली उसके हाथ। रूखी- सूखी खाकर वह तो, रोज काम पर जाता है। किसी और का सदन बनाता, निज घर से वह दूर है, हाँ, वह एक मज़दूर है। सर्दी गर्मी या बरसात, चलते रहते उसके हाथ। जीवन उसका बहुत कठिन है, कहता है किस्मत उसकी क्रूर है। हाँ, वह एक मज़दूर है।। _____✍️गीता »

एक अजन्मी की दास्तान

सुन्दर सपने देख रही थी, अपनी माँ की कोख में। मात-पिता का प्यार मिलेगा, भाई का भी स्नेह मिलेगा यह सब सुख से सोच रही थी, सहसा समझ में आया कि एक कैंची मुझको नोंच रही थी। क्यों कैंची से कटवाया, मुझको मेरी माँ की कोख में। पूछ रही है एक अजन्मी, एक सवाल समाज से। मैं भी ईश्वर का तोहफा थी, क्यों मेरे जीवन का अपमान किया। तुम्हें एक वरदान मिला था, क्यों ना उसका सम्मान किया। अगर मैं जीवित रहती तो, प्रेम से घर... »

माँ

अपनी माँ को छोड़ कर, वृद्धाश्रम के द्वार पर। जैसे ही वो बेटा अपनी कार में आया, माँ के कपड़ों का थैला, उसने वहीं पर पाया। कुछ सोचकर थैला उठाकर, वृद्धाश्रम के द्वार पर आया। बूढ़ा दरबान देख कर बोला, अब क्या लेने आए हो वह बोला बस यह माँ का, थैला देने आया हूं। दरबान ने फ़िर जो कहा उसे, सुन कर वह सह नहीं पाया, धरा निकली थी पैर तले से खड़ा भी रह नहीं पाया। वह रोता जाता था, भीतर बढ़ता जाता था मां सब मेरी ... »

फूलों की महफ़िल

सब फूलों ने मिलकर, महफ़िल एक सजाई। किस की सबसे सुन्दर रंगत, और किस की महक मन भायी। बेला चमेली और मोगरा ने महक कर, वेणी खूब सजाई। गेंदा और गुलाब ने, मन्दिर में धूम मचाई। हरसिंगार के फूलों ने, किया श्री हरि व हरि-प्रिया का श्रृंगार। पुष्प पलाश के लाए सखि, होली के उत्सव की बहार।। ____✍️गीता »

सागर और सरिता

सागर ने सरिता से पूछा, क्यों भाग-भाग कर आती हो। कितने जंगल वन-उपवन, तुम लांघ-लांघ कर आती हो। बस केवल खारा पानी हूं, तुमको भी खारा कर दूं। मीठे जल की तुम मीठी सी सरिता, क्यों लहराती आती हो। नि:शब्द हो उठी सरिता, उत्तर ना था उसके पास, बोली तुम हो कुछ ख़ास। ऐसा हुआ मुझे आभास, विशाल ह्रदय है तुम्हारा। फैली हैं दोनों बाहें देख, हृदय हर्षित होता है। आ जाती हूं पार कर के, कठिन कंटीली राहें।। ____✍️गीता »

बसन्त का आगमन

हवाओं ने मौसम का, रूख़ बदल डाला। बसन्त के आगमन का, हाल सुना डाला। नवल हरित पर्ण झूम-झूम लहराए। रंग-बिरंगे फूलों ने, वन-उपवन महकाए। बेला जूही गुलाब की, सुगंधि से हृदय हर्षित हुआ जाए। कोमल-कोमल नव पर्ण, अपने आगमन से जीवन में ख़ुशहाली का, सुखद संदेशा लाए। बीता अब पतझड़ का मौसम, हृदय प्रफुल्लित हुआ जाए।। _____✍️गीता »

पारिजात के फूल

पारिजात के फूल झरे, तन-मन पाए आराम वहां। स्वर्ग से सीधे आए धरा पर, ऐसी मोहक सुगंधि और कहां। छोटी सी नारंगी डंडी, पंच पंखुड़ी श्वेत रंग की। सूर्य-किरण के प्रथम स्पर्श से, आलिंगन करते वसुधा का। वसुधा पर आ जाती बहार, इतने सुन्दर हैं हरसिंगार। रात की रानी भी इनका नाम, ये औषधीय गुणों की खान। श्री हरि व लक्ष्मी पूजन में होते अर्पण, इनकी सुगन्ध सौभाग्य का दर्पण। कितनी कोमल कितनी सुंदर, इन फूलों की कान्ति... »

सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

“बदली जो उनकी आंखें इरादा बदल गया। गुल जैसे चमचमाया कि, बुलबुल मसल गया। यह कहने से हवा की छेड़छाड़ थी मगर खिलकर सुगंध से किसी का, दिल बहल गया।” सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की, “बदली जो उनकी आंखें” से ली गई चंद पंक्तियां निराला जी की जन्म २१ फरवरी १८९६ को, हुआ मिदनापुर बंगाल में। हाथ जोड़ शत्-शत् नमन है उनको, २०२१वें साल में। पिता,पंडित राम सहाय त्रिपाठी, माता का नाम था रुक... »

मेरा मन

किसी की सिसकियां सुनती थी अक्सर, कोई दिखाई ना देता था। देखा करती थी इधर-उधर, व्याकुल हो उठती थी मैं, लगता था थोड़ा सा डर। एक दिन मेरा मन मुझसे बोला.. पहचान मुझे मैं ही रोता हूं, अक्सर तेरे नयन भिगोता हूं। मासूमों पर अत्याचार, बुजुर्गों को दुत्कार, वृद्धाश्रमों में बढ़ती भीड़, नारियों की पीड़, इन्हीं से दिल दुखी है दुनिया में क्यों हो रहा है यह व्यवहार। कब समाप्त होगा यह अत्याचार, बस यही सोच-सोच कर... »

शब्द-चित्र

कहती है निशा तुम सो जाओ, मीठे ख्वाबों में खो जाओ। खो जाओ किसी के सपने में, क्या रखा है दिन-रात तड़पने में। मुझे सुलाने की कोशिश में, जागे रात भर तारे। चाँद भी आकर सुला न पाया, वे सब के सब हारे। समझाने आई फिर, मुझको एक छोटी सी बदली मनचाहा मिल पाना, कोई खेल नहीं है पगली। पड़ी रही मैं अलसाई, फ़िर भोर हुई एक सूर्य-किरण आई। छू कर बोली मस्तक मेरा, उठ जाग जगा ले भाग, हुआ है नया सवेरा।। ____✍️गीता »

धरती-पुत्र

मूसलाधार बारिश से जब, बर्बाद हुई फ़सल किसान की बदहाली मत पूछो उसकी, बहुत बुरी हालत है भगवन्, धरती-पुत्र महान की। भ्रष्टाचार खूब फैल रहा, काले धन की भी चिंता है। मगर किसी को क्यों नहीं होती, चिंता खेतों और खलिहान की। अपनी फ़सलों की फ़िक्र लेकर, हल ढूंढने निकला है हलधर लेकिन सबको फ़िक्र लगी है, अपने ही अभिमान की। मूसलाधार बारिश से जब, बर्बाद हुई फ़सल किसान की बदहाली मत पूछो उसकी, बहुत बुरी हालत है भ... »

शिक्षा का महत्व

वह पढ़ना चाहता है जीवन से लड़ना चाहता है। आगे बढ़ना चाहता है किंतु क्या रोक रहा उसको, कोई टोक रहा उसको बाप कहे कुछ कर मजदूरी, ऐसी भी क्या है मजबूरी चंद सिक्कों की खातिर, कौन कर रहा बचपन पर अत्याचार है, शिक्षा तो उसका अधिकार है। कोई इन्हें समझाए, यदि ये बच्चे शिक्षित हो जाएं, तो तुम्हारे ही घर का उद्धार है। देश का भी हित होगा, फिर क्यों इनका अहित हो रहा। मैं समझाती रहती हूं, अक्सर मिलती मुझको हार ह... »

मेहनत के रंग

वो बूढ़ी थी, गरीब थी भीख नहीं मांगी थी उसने, पैन बेच रही थी राहों में मेहनत का खाने की ठानी, मेहनत का ही खाती खाना मेहनत का ही पीती पानी। कहती थी यह पैन नहीं है, यह तो है किस्मत तुम्हारी खूब पढ़ना लिखना बच्चों बदलेगी तकदीर तुम्हारी। बदलेगा फिर भारत सारा, बदलेगी तस्वीर हमारी।। ____✍️गीता »

*नेत्रदान*

अंधा ना कहो आँखों वालों, मुझे नेत्रहीन ही रहने दो। आँख नहीं ग़म का सागर है, कुछ खारा पानी बहने दो। तुम क्या समझो आँखों का न होना, एक छड़ी सहारे चलता हूं। अपने ही ग़मों की अग्नि में, मैं अपने आप ही जलता हूं। कभी सड़क पार करवा दे कोई, मैं उसे दुआएं देता हूं। देख नहीं पाता हूं बेशक, महसूस सदा ही करता हूं। यह दुनिया कितनी सुंदर होगी, चाँद, सितारे सूरज इनके बारे में सुनता हूं। कभी देख पाऊं इनको मैं, ऐस... »

प्रदूषित पवन

आज फ़िर चाँद परेशान है, प्रदूषण में धुंधली हुई चाँदनी तारे भी दिखते नहीं ठीक से, आज आसमान क्यों वीरान है। आज फिर चाँद परेशान है। प्रदूषण का असर, चाँदनी पर हुआ चाँदनी हो रही है धुआं-धुआं। घुट रही चाँदनी मन ही मन, यह कैसी है अशुद्ध सी पवन दम घोट रही सरेआम है, आज चाँद फ़िर परेशान है। प्रदूषित पवन में विष मिले हैं, यह सुनकर सभी हैरान हैं। चाँदनी ले रही है सिसकियां, आज चाँद फ़िर परेशान है।। _____✍️गीता »

किसान की व्यथा

अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं, जन्म ले लिया किसान के देश कहे अन्नदाता मुझको, बैठा हूं सड़कों पर शान से। दिल्ली के बॉर्डर पर पड़ा हूं, अपने हक की खातिर मैं खेत छोड़ बॉर्डर पर बैठा, मैं भी हूं भारत मां का बेटा धरती पुत्र कह लो, या फिर कहो किसान रे अन्न उपजाऊं फिर खाना खाऊं, जन्म ले लिया किसान के पूरी सर्दी गुजर गई है, दिल्ली के ठंडे बॉर्डर पर थोड़ा सा ध्यान धरो तुम मेरी भी चंद आहों पर दुखी हुआ था तब ही ... »

झरना

पर्वतों की गोद से निकल, झरने का जल बह चला। मिलन करूं मैं धरा से, यह कह कर चला। मिलन हुआ धरा से, पर उस मिलन में, घना ताप सहकर जल बना वाष्प,बने मेघ और बरखा बन बरस गया। जल पहुंचाया वहां तक मेघों ने, जहां जन जीवन जल को तरस गया। सफ़ल हो गया जीवन झरने का, झर-झर झरते कुछ कर गया।। _____✍️गीता »

नारी

नारी को न समझो खिलौना मनुज, वह भी एक इंसान है। जन्म देती है इंसान को, सोचो कितनी महान है। बन कर मासूम सी बिटिया, तुम्हारा घर महकाने आई है। बन कर बहन जिसने, सजाई भाई की कलाई है। करके विवाह तुम्हारे संग, घर जन्नत बनाया है तुम्हारी सहभागिनी बन, तुम्हारा वंश बढ़ाया है फिर किस कारण से , उसे तुम तुच्छ कहते हो वह ममता की मूरत है, तुम्हारे परिवार को निज मान, बड़े प्रेम से अपनाया है। वह पावन अग्नि सी महान ... »

ग़रीब का बच्चा

कुछ दिनों से , एक इमारत का काम चल रहा था। वहीं आस-पास ही, कुछ मजदूरों का परिवार पल रहा था। छोटे-छोटे बच्चे, दिन भर खेलते रहते कुछ खेल। एक दूजे की कमीज़ पकड़कर, बनाते रहते थे रेल। हर दिन कोई बच्चा इंजन बन, चलता था आगे-आगे। बाकी बच्चे डब्बे बन, पीछे-पीछे भागे। इसी तरह हर दिन, यही खेल चलता था और हर रोज एक बच्चा , इंजन या डब्बे में बदलता था किंतु एक बालक सदा ही गार्ड बनता था, एक दिन मैंने उस बालक से प... »

पुष्प पलाश के

लाल ओढ़नी ओढ़ कर, देखो पलाश इठलाते हैं। वन में फैली है अग्नि ज्वाला, ऐसा स्वरूप दिखलाते हैं। होली आने से पहले ही, पलाश ने कर ली तैयारी। लाल रंग के पुष्प खिला कर, महकाई है वसुधा सारी। लाल रंग की, प्रकृति ने सिन्दूरी आभा बिखराई है। सृष्टि स्वयं ही बता रही है, ऋतु बसन्त की आई है। बागों में कोयल आई है, तुम भी अब आ जाओ ना। सुर्ख़ पलाश के पुष्पों जैसी, ख़ुशबू बिखरा जाओ ना।। _____✍️गीता »

बसंत पंचमी

माघ मास का दिन पंचम, खेतों में सरसों फूल चमके सोने सम। गेहूं की खिली हैं बालियां, फूलों पर छाई बहार है, मंडराने लगी है तितलियां। बहार बसंत की आई है, सुखद संदेशे लाई है। चिड़िया भी चहक रही हैं, हर कली अब महक रही है गुलाबी सी धूप है आई, कोहरे ने ले ली विदाई। पीली-पीली सरसों आने लगी, पीली चुनरी मुझको भाने लगी। नई-नई फसलें आती है, बागों में कोयल गाती है। भंवरे ने संगीत सुनाया है, फूल कहे मैं हूं यहां,... »

*आशा का एक दीप जलाए*

बैठे हैं आशा का दीप जलाए, उम्मीद की लौ मन में लगाए। व्यथा का तिमिर अड रहा, नैराश्य का आंचल बढ़ रहा नेत्र नीर नैनों में आए, प्रेम की दिल में ज्योत जलाए मन के द्वार पर, सजा कर स्वप्नों के तोरण, ढूंढती है आंखें अब आपको आशा का एक दीप जलाए।। _____✍️गीता »

गीत लिखा करती हूं

अपने मन का हर भाव लिखा करती हूं, कभी-कभी दुख तो कभी, अनुराग लिखा करती हूं। छोटी-छोटी मेरी खुशियां लिखने से बड़ी हो जाती हैं। बड़े-बड़े दुख के सागर, फ़िर मैं पार किया करती हूं। कभी हंसाती हूं आपको, अपनी कविता से मैं, कभी दुखित हो कर एकान्त में नेत्र नीर बहा लिया करती हूं। कभी जुदाई में आंखें सूनी, कभी नेह लिखा करती हूं। कभी बुनती हूं ख्वाब सुहाने रातों में, कभी भोर के गीत लिखा करती हूं। हां मैं भी ... »

राष्ट्रीय शोक दिवस

बहुत दुख भरा दिवस है, आज राष्ट्रीय शोक का। टूटी थी किसी की राखी, और किसी मां की उजड़ी कोख का। इस दुख भरे दिवस को , आज,प्रेम दिवस ना कहना। आज ही के दिन….. पुलवामा में ग़म के बादल आए थे याद करो उन वीरों को जो, घर ओढ़ तिरंगा आए थे। जला लहू पुलवामा में, जिन वीर जवानों का हाथ जोड़कर नमन है उनको, कोई और-छोर नहीं उनके बलिदानों का। कैसे स्वीकार करें आज गुलाब, वतन के शहीदों की आई है याद। हाथ जोड़कर न... »

जग में जब छा गया प्रकाश

कोई सो रहा हो, शयन कक्ष में अंधकार भी हो रहा हो, सूर्य की किरणें आएंगी, आ कर उसे जगाएंगी ऐसा वह सोच रहा हो किंतु यदि उसी ने, किरणों के प्रवेश का, बंद कर दिया हो द्वार तो किरणें कैसे जाएंगी उस पार कौन उसे जगा पाएगा कौन उसे बता पाएगा, कि दिनकर तो कब के आ चुके अपनी रौशनी फैला चुके, जग में छा गया प्रकाश भी, उसे उठाने का किया प्रयास भी, किंतु जो जगना ही न चाहे, उसे यह जग कैसे जगाए। _____✍️गीता »

तुम्हारा बहुत-बहुत आभार ज़िन्दगी

तुमने जो किया सब भला ही किया, तुमने जो दिया सब भला ही दिया। आरम्भ भी तुम्हीं से और अन्त भी तुम्हीं तक, तुम्हारा बहुत-बहुत आभार ज़िन्दगी । बिखरते ही जा रहे थे, एक माला के मनके ठहराव सा पा गए हैं,जज़्बात मेरे मन के। तुमने मुझे मुस्कुराना सिखाया ज़िन्दगी, कभी कठिन समय भी दिखाया ज़िन्दगी। मेरा हाथ थामें चलती रही सदा तुम, कभी जीत मिली, कभी मिली हार ज़िन्दगी। हर पल है तुम्हारा आभार ज़िन्दगी जो पल मिले न... »

यह कैसी विपदा आई है

उत्तराखंड की ऋषि गंगा में, ढह गया एक हिम-खंड। कुछ ही पलों में गिरी हिम-शिला, और नदिया उफन गई, ढह गए और बह गए, उस नदिया में घर कई। एक सुरंग में काम कर रहे, श्रमिकों पर टूटा कहर। करुण क्रंदन और त्राहि-त्राहि की, आ गई थी एक लहर। किसी ने अपना बेटा खोया, किसी का बिछुड़ा भाई है। एक बुजुर्ग सी दादी गिरकर, लहरों में समाई है। रो पड़े परिजन जिन्होंने, यह आंखों देखी सुनाई है। हे प्रभु बचाले उन लोगों को, यह क... »

मीठी वाणी बोलिए

वाणी से ही विष बहे, और वाणी से ही,बहे सुधा-रस धार। मीठी वाणी बोलिए, यही जीवन का सार। कण-कण में ईश्वर बसते, यही प्रकृति का आधार। निज वाणी से मनुज, न करना किसी पर प्रहार। घाव हो तलवार का, एक दिन जाए सूख। घाव हरा ही रह जाता है, जो वाणी दे जाए। सोच समझ कर बोल रे बंदे वरना अपने जाएंगे रुठ।। _____✍️गीता »

*हमें आजकल फुर्सत नहीं है*

आजकल चाय कॉफी का है सहारा, इसके बिना दिन कटे ना हमारा। हमें सिर उठाने की भी फुर्सत नहीं है, कभी कॉपी जांचो कभी प्रश्नपत्र बनाओ, कोई छात्र विद्यालय न आए तो उसको मनाओ। करके दूरभाष पर बात मात-पिता से, विद्यालय आने के लिए समझाओ। उंगलियों में कलम है हाथों में है कागज़ भी, हाय! कविता लिखने की हम को फुर्सत नहीं है। छात्रों की आजकल बस कॉपियां जांचते हैं, थोड़े-थोड़े उनको नंबर भी बांटते हैं। कितनी मिस कॉल ... »

धीरे-धीरे चल

सिर पर दुपट्टा मेरा, पैरों में झांझर। कमर में पानी की गगर बोले, धीरे-धीरे चल गोरी गांव में आकर, झांझर के घुंघरू छम-छम बोलें। सिर पर दुपट्टा मेरा, माथे पर बिंदिया है। कानों में मैंने कुंडल हैं डाले, धीरे-धीरे चल गोरी गांव में आकर। कानों के कुंडल हौले से बोलें।। ____✍️गीता »

एक युद्ध..

जब आंख से एक आंसू छलका, हो गया मन कुछ हल्का-हल्का। निकल गया था कुछ रुका-रुका सा, एक गुबार बीते कल का। वजन था आंसुओं में भी, कभी सोचा नहीं था ये संयम रखते रखते, ना जाने कब आंख में आंसू आए। अंतर्मन में आरंभ हो गया एक युद्ध….. अपने ही विरुद्ध ।। _____✍️गीता »

अभी कुछ दिन और

विद्यालयों में रौनक लग गई, देखो फ़िर से कक्षाएं लग गई। फ़िर से बच्चों का है शोर, प्री बोर्ड का अब है जोर। बच्चों मास्क लगाकर आओ, शिक्षा संग सेहत भी पाओ। मिल-जुल कर रहो हम ही कहते थे, लेकिन बीता अब वो दौर। दूर-दूर सब की सीट लगी है, एक ओर नीतू बैठी है,मेघा बैठी है दूजे छोर। बीतेगा एक दिन यह भी दौर। आएगी फ़िर से नई एक भोर, मास्क लगाकर दूरी बनाकर, बैठो अभी कुछ दिन और। _____✍️गीता »

संकष्ट चतुर्थी

शुभ संकष्ट चतुर्थी आई है, गणपति का आशीष लाई है। भोग लगाएं तिलकुट का, हर बाधा दूर भगाई है। इस दिन गणपति की उपासना से, हर संकट का नाश हो, तन निरोगी और दीर्घायु बने, घर में सुख समृद्धि का वास हो। रिद्धि-सिद्धि का आशीष मिले, पूजन धूप दीप नैवेद्य से हो। पूजा में तिल लड्डू, शकरकंद चढ़ें, सपरिवार सुखी समृद्ध हो। प्रथम पूज्य श्री गणेश का, आह्वाहन हो विधि विधान से। बल, बुद्धि और विवेक प्राप्त हो, गणपति के ... »

जन्म-दिन का उपहार

शिशु वस्त्रालय के पुतले से, एक बालक कर रहा था बातें , कितने सुंदर वस्त्र तुम्हारे एक भी ऐसे नहीं पास हमारे। परसों मेरा जन्म-दिन है, नए वस्त्र पहनने का मन है, मां को मालकिन ने पैसे नहीं दिए तो, नई वस्त्र नहीं आएंगे। मां के आगे कुछ ना बोलूंगा, पर नयनों में अश्रु आएंगे, थोड़ी देर एकान्त में रो लूंगा। पापा भी तो नहीं हैं मेरे, मम्मी बोली बन गए तारे। मैं भी कुछ लेने को आई हूं, इस बालक की बातें सुनकर मन... »

पौष पूर्णिमा के चंद्र

पौष पूर्णिमा के चंद्र देखो, नभ में कैसे चमक रहे हैं। सर्द रातों में चांदनी सहित, देखो ना कैसे दमक रहे हैं। चांदनी भी ठंड में सिमटी सी जाए, चंद्र उसको देख-देख मुस्काएं। यह ठंड का असर है या हया है, ये तो चांदनी ही बतला पाए। चंद्र रीझे जाते हैं अपनी चांदनी पर, चांदनी भी इठलाती जाए।। ____✍️गीता »

समय कीमती धन

समय कीमती धन है सबसे, सृष्टि का निर्माण हुआ है तब से। समय खर्च करने से आपको, कुछ धन मिल सकता है। किंतु धन खर्च करने से, बीता समय नहीं मिलता है। सोच समझ कर समय खर्च करो, बेवजह ना इसको व्यर्थ करो। जीवन में हमें समय देते हैं जो लोग, हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं वो लोग। या यूं समझो कि…. उनके लिए महत्वपूर्ण हैं हम, तभी तो देते हैं वह हमें अपना कीमती धन। जिसका नाम है समय समय के साथ उनकी भी कद्र करो, औ... »

इच्छा-शक्ति

यदि इच्छा-शक्ति हो सबल, तो हर कार्य करना हो सरल। योग्यता यदि कम भी है तो, इच्छा-शक्ति का विस्तार करो। किसी कार्य को कभी ना समझो भार, हर दायित्व से प्यार करो। फ़िर कठिन डगर भी कट जाएगी, कोई बाधा होगी, वह भी हट जाएगी। बस रहे लक्ष्य पर नजर तुम्हारी, फ़िर तुम्हें हर राह मंजिल तक पहुंचाएगी।। _____✍️गीता »

मेरा मन भी करता है

इन मैले वस्त्रों में घूमूं, अच्छा नहीं लगता है। मैं भी कुछ बनूं,उडूं गगन को चूमूं, मेरा मन भी करता है। माँ संग जाना बर्तन धोना, अच्छा नहीं लगता है। मैं भी कुछ पढूं-लिखूं, मेरा मन भी करता है। फ़िर आकर अपनी झुग्गी में, मन्द रोशनी में बैठूं, अच्छा नहीं लगता है। मेरे घर भी बल्ब जलें, पढ़कर किसी परीक्षा में बैठूं मेरा मन भी करता है। बहुत हो चुका घर-घर का काम, अब मैं भी विद्यालय जाऊं, मेरा मन भी करता है... »

गांव में आई हूं

गांव में आई हूं मैं । बहुत दिनों के बाद। खेतों में सरसों पीली देखी, गगन की रंगत नीली देखी। खूब चमकते तारे देखे, बहुत दिनों के बाद। गेहूं की सुनहरी बाली देखी, तरुवर की झूलती डाली देखी। गन्नों की हरियाली देखी, बहुत दिनों के बाद। चूल्हे पर बनी साग और रोटी, दूध पर वह मलाई मोटी। रस की बनी खीर खाई है, बहुत दिनों के बाद। ताजा-ताजा गुड़ बनकर आया, गरम-गरम गाजर का हलवा खाया, सभी छोटे बड़ों का प्रेम पाया, बह... »

गणतंत्र दिवस की झांकी

सुन्दर-सुन्दर झांकियों में समाया भारत, आज राजधानी के राजपथ पर आया भारत। केरल कर्नाटक आंध्र प्रदेश अरुणाचल, सब की झांकी आई है। केरल ने नारियल के सुनहरे फाइबर से, सारी झांकी सजाई है। कर्नाटक ने स्वर्ण युग की, यादें ताजा करवाई हैं। आंध्र प्रदेश ने देखो नंदी की मूर्ति लगाई है, लोपाक्षी स्थापत्य कला की, देश को भव्यता दिखलाई है। अरुणाचल ने पूर्व से पश्चिम तक की, पुरातन सभ्यता दिखलाई है। यह उगते सूर्य की... »

Page 1 of 11123»