कविता- डांट
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ओ शब्द
गूंज रहा,
सामने होकर,
सौ सवाल कर रहा|
सुधर गए,
समझ गए,
संभल गए,
या किसी की बातों में,
फिसल गए,
नारियल से सीख,
गन्ने से सीख,
क्रोध, ग्लानि
घृणा महसूस हो,
चला जा गाँवों में
कुम्हार की
थपकी से सीख
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***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”
डांट
Comments
5 responses to “डांट”
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बेहतरीन
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Tq
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बहुत उच्चकोटि की रचना हम पढ़ते ही रह गये
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत ख़ूब
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