क्या करना है मुझे यहां
ठिकाना बनाकर
मन चंचल है लगता है कहाँ
एक ही जगह पर
बदलकर फिर आऊंगा वेश मैं अपना
घायल परिंदा हूँ
गिरा हूँ धरा पर
फिर उठूंगा, चलूंगा
बनाऊंगा आसमां में रास्ता अपना
गिरूंगा तो जरूर पर फिर से उड़ूंगा…!!
घायल परिंदा
Comments
8 responses to “घायल परिंदा”
-
अतिसुंदर भाव
-

धन्यवाद
-
-
वाह बहुत खूब
-

धन्यवाद
-
-

सुंदर अभिव्यक्ति
-

धन्यवाद
-
-

This comment is currently unavailable
-

Thanks
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.