सामने बैठे हो
सब कुछ बयान कर दो ना
चाहना है अगर
इजहार कर दो ना।
उड़ा के नींद ऐसे
बेखबर से सोते हो
रखनी हैं दूरियां गर
दिल्लगी क्यों बोते हो।
बोल दो जो भी है
मन में बसा, सुनाओ तो
बीतता जा रहा
अनमोल पल क्यों खोते हो।
—– सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।
अनमोल पल क्यों खोते हो
Comments
3 responses to “अनमोल पल क्यों खोते हो”
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बहुत खूब
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बहुत सुंदर लाजवाब
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वाह सर, बहुत ही स्तरीय कविता
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