सुबह सवेरे द्वार पे मेरे,
एक निर्धन ने पुकारा
एक बालक था गोद में उसकी,
ठंड से कांप रहा बेचारा
मैंने झटपट एक स्वेटर लाया
और उस बालक को पहनाया
करुण भाव उपजा था मन में,
एक कंबल भी उसे ओढ़ाया
निर्धन की सर्दी बड़ी कठिन है,
सर्दी से निर्धन है हारा
गर तुम्हें क्षमता हो तो,
देना किसी निर्धन को सहारा ।।
______✍️गीता
निर्धन की सर्दी
Comments
4 responses to “निर्धन की सर्दी”
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करुणा भरी दासतां और मानवता दर्शाती गीता जी की रचना
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समीक्षा हेतु बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
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अतिसुंदर भाव
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बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏
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