नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी

घास पूस की झोपड़ी
मैया है बीमार
चौदह की गुड़िया ने थामी,
है घर की पतवार।
भूख बीमारी बेहाली के
झंझावात घिरे हैं,
गलत नजर से देख रहे
श्वानों से सिरफिरे हैं।
चूल्हा-चौका सब करना है
भैया-बहनों की देखभाल,
नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी
अच्छे से है ली संभाल।
हालातों से जूझ-जूझकर
हुए तजुर्बे जीवन के,
लगी हुई है खूब निभाने
फर्ज-कर्ज इस जीवन के।

Comments

3 responses to “नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी”

  1. Geeta kumari

    “हालातों से जूझ-जूझकर हुए तजुर्बे जीवन के,
    लगी हुई है खूब निभाने फर्ज-कर्ज इस जीवन के।”
    _____ जब कम उम्र में ही ज़िम्मेदारी का बोझ पड़ता है तो बचपन में ही जीवन के तजुर्बे मिल जाते हैं, इस कथन को कहती हुई कवि सतीश जी की , कठिन जीवन की सच्चाइयों से समाज को रूबरू करवाती हुई , रुचिर लय बद्धता लिए हुए बहुत उत्कृष्ट रचना है

  2. बहुत ही लाजवाब कविता लिखी है सर

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