6 Comments

  1. कभी कोई कांटे बिछा दे राहों में,
    कांटे चुन-चुन के दूर कर दो।
    इस तरह बढ़ाओ आत्म-बल,
    कि अरि के स्वप्न चूर कर दो।
    — कवि गीता जी यह प्रखर रचना है। अपने आत्मबल को ऊंचा रखकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गई है। कविता के भाव भी चिंतन के नये रचनात्मक सतह पर कविता को गढ़ने के यत्न से संबंधित है। बहुत खूब

    1. आपकी इतनी अच्छी समीक्षा हेतु धन्यवाद शब्द कम पड़ रहे हैं सर। प्रेरणस्रोत बनी समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार सतीश जी

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