मुक्तक-खाएंगे
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अब बनाने वाले ही खाएंगे ,
कोई खाने वाला रहा नही,
लगता है, सब दावत मे गए,
या घर सब, रुठ के छोड़ गए
पर गए कहां यह पता नही,
पता होता तो हम उन्हें बुलाते,
अब घर सूना सूना लगता है,
कवियों के बिन सावन अपना
रुखा रुखा सा लगता है|
जो जुड़े हुए हैं ईश्वर उनके साथ रहो,
जो जुड़ कर चले गए –
ईश्वर उनको मेरा पैगाम सुना दो,
कोई याद किया है
कविता शायरी गजल गीत,
पढ़ने के लिए उत्सुक है,
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**✍️ ऋषि कुमार प्रभाकर–
खाएंगे
Comments
One response to “खाएंगे”
-
बहुत खूब
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