मधु छलके भीतर

कोई दिक्कत है अगर
सीधे सीधे बोल,
भीतर-भीतर विष जड़ी
मत रखना तू घोल।
मत रखना तू घोल
जहर दूजे को देने,
पड़ जायेंगे कभी
तुझे लेने के देने।
कहे लेखनी अमिय,
बाँट ले बाहर भीतर,
होंठों में हो हँसी
और मधु छलके भीतर।

Comments

5 responses to “मधु छलके भीतर”

  1. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    खूब कहा

  2. बहुत ही बढ़िया

  3. बहुत उम्दा रचना

  4. Geeta kumari

    “मधु छलके भीतर” कवि सतीश जी की बहुत सुंदर कविता

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