कर के आया था मजदूरी,
था थकन से चूर।
रूखा-सूखा खा कर सो गया,
वह बूढ़ा मजदूर।
ओढ़ी एक फटी थी चद्दर,
उसके सूराख़ों से घुस गए मच्छर।
हाथ पैर पटकता था,
मच्छर भगाने को।
एक पॅंखा भी नहीं था,
उसके पास चलाने को।
चद्दर भी साबुत थी तब तक,
चल जाता था काम।
अब तो रात को भी उसको,
नहीं मिले आराम।
नहीं मिले आराम बहुत झुॅंझलाया,
बोला हे प्रभु तुमने मुझको
इतना निर्धन क्यों बनाया॥
____✍गीता
मजदूर
Comments
2 responses to “मजदूर”
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बहुत लाजवाब लिखा है
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आभार इंद्रा जी, धन्यवाद मैम
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