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  1. क्रोध स्वयं के लिए गरल है
    मत करना विषपान।
    विष से अंग गलेंगे भीतर
    बाहर फीकी शान,
    ___________ संपूर्ण कविता बहुत ही सुंदर संदेश लिए हुए है। यह सत्य है कि क्रोध विष के समान ही है, “वाचा में रख प्रेम मधुरिमा,” वाणी की मधुरता ही सबको प्रिय होती है, बहुत सुंदर संदेश देती हुई कवि सतीश जी की अति श्रेष्ठ रचना, उच्च स्तरीय लेखन

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