मुक्तक

मुक्तक
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मै मुर्गी खाऊ
वो पाप बताते हैं
वो कुकुरमुत्ता खाएं
गर्व से स्वाद बताते हैं

आगे से निकला पीछे से निकला
उसका ऐसा वैसा स्वाद बताते हैं,
शाकाहारी मांसाहारी कह करके
सुबह शाम भोग लगाकर सोते हैं,

अब कुछ भक्त अंधभक्त बोलेंगे
धर्म जाति के नाम पर रोयेंगे,
सच कहने ना सुनने की हिम्मत है
चीनी खाएं गुड़ में दोष दिखाएंगे,
——–
कवि-ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’-

Comments

7 responses to “मुक्तक”

  1. Ekta

    बहुत खूब

  2. राकेश पाठक

    Nice

  3. Pragya

    बहुत खूब

  4. बहुत ही खूबसूरत पंक्तियां

  5. सराहनीय रचना 

  6. Amita

    व्यंगय के साथ पंक्तियों में सुंदर समाहार

  7. बहुत सुंदर रचना

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