कदमों की दिशा

कदमों की दिशा
तूने खुद ही बनानी पड़ेगी,
लोग जायें उधर
लोग जायें इधर,
अपनी मंजिल तुझे
खुद ही चुननी पड़ेगी।
अपने सपनों की सीढ़ी
बनानी पड़ेगी,
और सपनों की डलिया भी
बुननी पड़ेगी।
साफ दिखने को चेहरा
दिखावा भले
उगती दाढ़ी तुझे ही
बनानी पड़ेगी।
मुश्किलें राह में
जो भी आयें तेरे
तूने हिम्मत से मुश्किल
भगानी पड़ेगी,
थक अगर पैर जायें
तेरे राह में,
तूने हिम्मत दुबारा
जगानी पड़ेगी।
सुख जायें पलक
सूख जायें हलक
दिल में पत्थर जमे,
मन भी सूखा लगे
तूने पानी की गाड़ी
बुलानी पड़ेगी,
सुध रहे ना रहे
कोई कुछ भी कहे
तूने थोड़ा पलक तो
हिलानी पड़ेगी

Comments

2 responses to “कदमों की दिशा”

  1. Praduman Amit

    वाह पांडे जी। भावपूर्ण रचना है।

  2. कदमों की दिशा
    तूने खुद ही बनानी पड़ेगी,…. 

    बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना… उत्कृष्ट प्रस्तुति

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