नभ में बादल घुमड़ रहे हैं,
पंछी भी इधर-उधर उड़ रहे हैं l
वृक्षों की ड़ाली पर बैठी,
कोयल कुहू-कुहू करती l
लगता है बरखा आएगी,
धरा की प्यास बुझा जाएगी l
पेड़-पौधे सब झूम रहे हैं,
वृक्ष लताओं को चूम रहे हैं l
कैसी अद्भुत छटा निराली,
धरती पर होगी हरियाली॥
____✍गीता
अद्भुत छटा
Comments
2 responses to “अद्भुत छटा”
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सुंदर शब्दों में रचित आपकी कविता तारीफ़ ए क़ाबिल है।
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बहुत बहुत धन्यवाद सर
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