न जाओ

आंखें चुरा कर जाओ भले ही,
दिल न चुरा कर जाओ।
बिखरे हुए हैं मोती नयन के,
उनको जुड़ा कर जाओ।
बाहर बरखा बरस रही है,
अतर नदी सी पथ में पड़ी है
रुकने दो बहने दो,
तब तक बैठो आओ।
यूँ ही न जाओ न जाओ।

Comments

2 responses to “न जाओ”

  1. भाव और शिल्प का बहुत सुन्दर संगम, बहुत सुन्दर कविता

  2. Rohit

    Bahut khoob

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