कयी जिम्मेदारी है
“ऐ आत्मजा” तुम पर
हासिल करना है तुझे
छिपा जो क्षितिज पर।
लगन जगाना है कुछ ऐसा
मशाल बन जाए वो वैसा
मिशाल मिल न पाए तुझ जैसा
अनुसरण करें तूं बढ़े जिस डगर पर
हासिल करना है तुझे,छिपा जो क्षितिज पर।
तूं सिर्फ मेरी दुहिता नहीं
कयी प्रभार हैं, तुझ जैसों की, तुझ पर
चमकना है नक्षत्र बनके
बुलंदी की सबसे ऊंची शिखर पर
लब्ध हो वह मुकाम तुमको
जहां नतमस्तक हो, तेरे आगे पुष्कर
हासिल करना है तुझे, छिपा जो क्षितिज पर।
तरगंनी सी प्रवाह को समेटे
तूं बढ़ती रहे निरंतर
तेरी दृढ़ता के आगे
विघ्न हो जाए निरुत्तर
दामिनी सी तेज़ तुझमें
गर्वित हो तेरी फतह सुनकर
बग़ैर डर के, उम्मीद मरीचि-सी
प्रतिक्षण होती रहे तूं अग्रसर
हासिल करना है तुझे, छिपा जो क्षितिज पर।
तूं नन्दनी है मेरी
अरुणोदय की पहली प्रभा
लब्ध करना है तुझे
मंजिल-ए-मकसूद जो तूने चुना
गर्विता कहलाऊंगी उस दिन
पग न होंगे मेरे क्षिति पर
हासिल करना है तुझे, छिपा जो क्षितिज पर।
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