बूंद की किंचित उदासी
बूंद ही सुन ले अगर
क्यों मिले सागर में जाकर
गुत्थी ये सुलझे अगर
तो स्वयं ही हो समाधानों की
अविरल बारिशें
क्यों हृदय में हो मिटाने की
अमिट फरमाईशें।।
बूंद की किंचित उदासी
Comments
2 responses to “बूंद की किंचित उदासी”
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बहुत सुन्दर रचना
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धन्यवाद
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