मेरा पहला प्यार – मेरी मां

क्या वो मेरा पहला प्यार था
जब तुम्हारा स्पर्श
इस दिल की धड़कनों को
चेतक बना देता था
या तुम्हारी लटों का
उड़ कर बार बार
मेरे चेहरे पे आना
मुझे बेसुध कर जाना
छण भर में फिर आना
और फिर चेतन कर जाना
जैसे वो सिर्फ लटें न हो
संजीवनी हो।

समय गुजरता है
लोग आते है,
लोग जाते है
अक्ल आती है
मन खुद से सवाल करता है
कि क्या ये सच में मेरा पहला प्यार था?
अनेकों सवालों का सैलाब
उमड़ पड़ता है
फिर अचानक
तमाम सवाल शांत हो जाते हैं
जब मां याद आती है
उसका संजीवनी स्पर्श
याद आता है
सारे सवालों का जवाब
खुद मिल जाता है
हां,मेरी मां
मेरा पहला प्यार
मेरी मां

Comments

3 responses to “मेरा पहला प्यार – मेरी मां”

  1. बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति 

  2. Geeta kumari

    माँ पर बहुत सुन्दर और सच्ची पंक्तियाँ

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