पहले की जैसी ही

मौसम तुम भी
बदलते रहे, बदलते रहे।
कभी सुखा गए,
कभी अंकुर उगाकर
फूल खिलाकर
फल लगाकर,
फल पकाकर,
बांट गए।
फिर पतझड़ बना गए।
फिर नई कोपलें फूटी
पुरानी धारणाएं टूटी,
नई जुड़ी, फिर वैसी ही,
पहले की जैसी ही।

Comments

One response to “पहले की जैसी ही”

  1. मौसम और जीवन पर आधारित कवि सतीश जी की यथार्थ प्रस्तुति

Leave a Reply

New Report

Close