कुर्सी

कुर्सी
आप भी निराली हो,
तरह तरह के लोगों के लिए
तरह-तरह की छवि वाली हो।
अलग-अलग लोग
अलग अलग तरह की कुर्सी,
छोटी-बड़ी, कच्ची-पक्की
स्टाइलिश, साधारण
लकड़ी की
प्लास्टिक की,
कठोर, आरामदायक।
हर तरह की हो,
कुर्सी तुम
तरह-तरह की हो।

Comments

2 responses to “कुर्सी”

  1. यथार्थ परक रचना

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    कुर्सी तेरी बात निराली
    पाण्डेयजी ने सब कह डाली। अतिसुंदर।

Leave a Reply

New Report

Close