कूलंकषा बहती रही

कूलंकषा बहती रही,
निज राह में, किस चाह में,
साथ बहते रहे कण
पर न जाने किस चाह में।
बीतता चलता रहा
क्षण निरंतर राह में
दे गया खुशियां किसी को,
कुछ रहे बस आह में।
रोकना चाहा समय को
रोकनी ने राह में,
फिर भी किनारे से निकल वह
बह चला निज राह में।

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