बिना रोशन किये भीतर

बाहर सूरज है
चाँद है, सितारे हैं,
मगर भीतर स्वयं के देखने को
हमें दीपक जलाना पड़ेगा।
पवित्रता की बाती
स्नेह का दिया,
किया तो अच्छा कर किया
अन्यथा रहने दिया।
बिना रोशन किये भीतर
चमक कितनी रहे बाहर,
मगर वह कालिमा की लय
छलक आती है कुछ बाहर।

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One response to “बिना रोशन किये भीतर”

  1. कवि सतीश जी द्वारा रचित उच्च स्तरीय रचना

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