बूंदें न डालो ठंडी
ओ बादल!!!
ठिठुर गया तन मेरा।
नील गगन ही,
छत था मेरा,
आज उसे है तुमने घेरा,
कुहरा-कुहरा, दिन में अंधेरा,
रात हुई, संशय ने घेरा,
मिल पायेगा या न सवेरा,
संशय ने है घेरा।
ठिठुर गया तन मेरा।
बूंद न डालो ठंडी
ओ बादल,
मांगे रहम पगडंडी।
बूंद न डालो ठंडी
Comments
2 responses to “बूंद न डालो ठंडी”
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पगडंडी का मानवीकरण करती हुई और यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती बहुत सुंदर कविता
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Jay ram jee ki
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