उसने एक आस लगाई थी

हाँ उसने एक आस लगाई थी।
सोचा था एक दिन मिल जायेगा वो ख़्वाब जो बचपन से देखा हैं।
पर बदल गया ये संसार जैसे कोई बुरा सपना हो।
लेकिन अपना कर उस बुरे सपने को उसने एक आस लगाई थी।
पर इस जमाने को उसकी ये आस भी रास ना आई।
हाँ फिर भी उसने एक आस लगाई थी।

Comments

One response to “उसने एक आस लगाई थी”

  1. Sumit Singh

    Acchi hai Kavita…lekin isase better ho sakta tha…thode jagah tukt baith sakte the.. aur aakhiri line par agar aap aur sochte to aur unique ho sakta tha….and Upar ek jagah “ख़्वाब जो बचपन से देखा हैं” यहां है पर अनुस्वार नही आएगा। यहा पर है ऐसे ही आएगा।

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