वचन सिंदूर मंगलसूत्र मंडप भी सजाया है
तुम्हारे नाम का कुमकुम माथे पर लगाया है
कन्यादान सातों फेरे सारे विधि विधानों से
मिली थी कुंडली तब जा के तेरा साथ पाया है
अधर हैं बेसुरे इतने तुम इनका राग बन जाओ
मैं काया बन गई तेरी तुम मेरी लाज बन जाओ
मेरे माथे की बिंदी स्वेद गंगा में नहाई है
उतारो चूड़ियां मेरी खनक धड़कन की बन जाओ।
पिघलकर मोम अग्नि में समाहित जैसे होता है
कड़कती धूप में जैसे की चंदा हाथ धोता है
बरस कर मिल रहा है यूं धरा में आज ये अंबर
रति के मन में जैसे काम अपने बीज बोता है।
धुला उजाला बदन उस पर मसक ये लाल कैसी है ?
ठिठोली कर रही सखियां अधर मुस्कान कैसी है ?
वो सोलह साल की लड़की शिकायत रोज करती थी
शरारत हो गई इतनी मगर अनजान कैसी है।
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