लग रही हैं अभी चंद घड़ियां हमें
खा के ठोकर मगर हम संभल जायेगे।
तुम हमें आज तक शूल कहते रहे,
हम सुमन बन के मधुवन को महकाएंगे।
मार्ग में तो कदाचित स्वत आ गए
किंतु निश्चित नहीं हमको जाना कहां।
आज तक तो सुगमता से चलते रहे
अब विफलता ने बांधा है सारा समां।
करवटें ले रही है अभी जिंदगी,
नींद निद्रा की तोड़ेंगे चल पाएंगे।
हम सफर में तो हैं हम सफर ही नहीं
जिंदगी है मगर जिंदगी ही नहीं।
आधुनिकता के हाथों में आ कर गया
प्रेम में अब समर्पण रहा ही नहीं।
प्रीति राधा सी रह कर निभाई सदा
श्याम हमको भी तज कर चले जायेंगे।
कुछ कुरेदे हुए लेख हैं पीठ पर
उंगलियों से जिन्हें था उकेरा गया।
मुठ्ठियों से तुम्हारी वो रातें गईं
नर्म हाथों से मेरे सवेरा गया।
अब विरह की बनावट के सांचे तले
हम मिलन के सुगम गीत गढ़ पाएंगे।
बेजुबान प्रेम मेरा जुबां आ गई
ये चपलता मेरी प्रेम को खा गई
हाथ फैला के मांगा जो अधिकार को
चांदियों से बनी हथकड़ी आ गई।
साज श्रृंगार अब तक तुम्हारे लिए
चूड़ियां अब कहीं और खनकायेंगे।
प्रज्ञा शुक्ला, सीतापुर
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